सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 797 · Raag Bilaaval · Guru Amar Daas Ji

1उन्हें मनमुख कहा जाता है, जो भ्रम में फँसकर कुमार्गगामी हो गए हैं और इस तरह के व्यक्ति लोक-परलोक कहीं के भी नहीं रहते॥ ३॥

2जिस पर परमात्मा अपनी करुणा-दृष्टि करता है वही उसे पा लेता है और गुरु का शब्द स्मरण करता रहता है।

3ऐसे भक्तजन माया से मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं।

4हे नानक ! जिसके मस्तक पर उत्तम भाग्य लिखा होता है, वह मौत पर विजय पाकर आवागमन से छूट जाता है॥ ४॥ १॥

5बिलावलु महला ३ ॥

6परमात्मा अतुलनीय है, फिर उसे कैसे तोला जा सकता है ?

7यदि कोई दूसरा उस जैसा हो तो ही वह उसकी सूझ डाले।

8सत्य तो यही है कि उसके सिवा दूसरा कोई नहीं है।

9अतः उसकी कीमत कैसे आंकी जाए॥ १॥

10गुरु की कृपा से वह मन में आकर बस जाता है और

11उसे वही जानता है, जिसकी दुविधा दूर हो जाती है। १ ॥ रहाउ ॥

12परमात्मा स्वयं ही सर्राफ है और स्वयं ही जीवों को परखने के लिए कसौटी लगाता है।

13वह स्वयं उनके गुण-अवगुण की परख करके सन्मार्ग पर चलाता है।

14वही पूर्ण होता है, जिसे वह स्वयं तोलता है और

15एक परमात्मा ही सबकुछ जानता है॥ २॥

16यह जगत् माया का रूप है और सभी जीव उससे ही उत्पन्न हुए हैं।

17जिसे वह अपने साथ मिला लेता है, वह निर्मल हो जाता है।

18जिसे वह माया का मोह लगता है वह उसे ही आकर लग जाती है।

19जब वह अपना सत्यस्वरूप दिखाता है तो जीव उस सत्य में ही विलीन हो जाता है।॥ ३॥

20वह स्वयं ही वृति है और स्वयं ही माया है।

21वह स्वयं ही जीव को सूझ प्रदान करता है और स्वयं ही जीव रूप में अपना नाम जपता रहता है।

22वह स्वयं ही सतगुरु है और स्वयं ही शब्द है!

23हे नानक ! ईश्वर स्वयं ही कहकर जीवों को अपना नाम सुनाता है॥ ४ ॥ २॥

24बिलावलु महला ३ ॥

25मालिक का बनाया हुआ ही कोई उसका सेवक बनता है और उसे सेवा भी मालिक से ही मिली होती है, फिर कोई यूं ही क्या बहाना बना सकता है ?

26हे प्रभु ! तेरा एक ऐसा खेल बना हुआ है कि एक तू ही सब जीवों में समाया हुआ है।॥ १॥

27जब मन सतगुरु से संतुष्ट हो जाता है तो हरि-नाम में लीन हो जाता है। लेकिन सतगुरु उसे ही मिलता है, जिस पर परमात्मा मेहर करता है और फिर जीव का रात-दिन परमात्मा में ध्यान लगा रहता है॥ १॥ रहाउ ॥

28हे परमपिता ! कोई तेरी सेवा क्या कर सकता है और कोई सेवा का क्या अभिमान कर सकता है ?

29हे स्वामी ! जब तू शरीर में से अपनी प्राण रूपी ज्योति खींच लेता है, तब कोई सेवा करके बखान तो करके दिखाए॥ २॥

30गुरु एवं चेला स्वयं परमात्मा ही है और स्वयं गुणों का भण्डार है।

31हे भगवान् ! जैसे तुझे उपयुक्त लगता है, वैसे ही तेरी इच्छानुसार कोई चलता है॥ ३॥

32नानक का कथन है कि हे जगत्पालक ! तू सच्चा मालिक है और तेरे विलक्षण कार्यों को कौन जानता है ?

33तू किसी को घर बैठे ही यश प्रदान कर देता है और कोई अभिमानी बनकर भ्रम में ही भटकता रहता है॥ ४॥ ३ ॥

34बिलावलु महला ३ ॥

35हे जिज्ञासु! देख लो, पूर्ण परमेश्वर ने पूर्ण ही जगप्रपंच बनाया है और यही सब में समाया हुआ है।

36इस जगत् प्रपंच में सत्य -नाम की ही कीर्ति है, अतः मन में किसी प्रकार का घमण्ड मत करो॥ १॥

37जिसे सतगुरु की मत (बुध्धि) आ जाती है, वह उस में लीन हुआ रहता है,

38जो इस वाणी को अपने मन में श्रद्धापूर्वक जान लेता है, उसके अन्तर्मन में हरि-नाम स्थित हो जाता है।॥ १॥ रहाउ॥

39चहुं युगों का अब यही निष्कर्ष है कि मनुष्यों के लिए एक नाम ही अमूल्य भण्डार है।

40सतियुग, त्रैता एवं द्वापर-उन युगों में ब्रह्मचार्य, संयम तथा तीर्थ स्नान ही धर्म था परन्तु कलियुग में हरि नाम की कीर्ति करना ही विशेष धर्म है॥ २॥

41प्रत्येक युग में अपना अपना भिन्न धर्म है। चाहे वेदों एवं पुराणों का अध्ययन करके देख लो।

42जिन्होंने गुरु के माध्यम से हरि का मनन किया है, वे जगत् में पूर्ण और स्वीकार हो गए हैं।॥ ३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं