गुरु ग्रंथ साहिब 792 · Raag Soohee · Guru Angad Dev Ji
1जब तक तू मेरे चित्त में आकर नहीं बसता, तब तक क्यों न में रो रो कर मृत्यु को प्राप्त हो जाऊँ।१॥
2महला २॥
3अगर सुख हो तो भी पति-प्रभु को स्मरण करो और दुख में भी उसकी स्मृति में लीन रहो।
4नानक कहते हैं कि हे बुद्धिमान स्त्री ! इस प्रकार पति-प्रभु से सच्चा मिलन होता है॥ २॥
5पउड़ी।
6हे ईश्वर ! तेरी महिमा बहुत बड़ी है, फिर मैं कीड़े जैसा छोटा-सा जीव तेरी क्या स्तुति करूं ?
7तू अगम्य, दयालु एवं अपरंपार है और स्वयं ही अपने साथ मिला लेता है।
8तेरे सिवा मेरा कोई साथी नहीं है और अन्तिम समय तू ही सहायक होता है।
9जो तेरी शरण में आता है, तू उसे यम से छुड़ा लेता है।
10हे नानक ! परमात्मा बेपरवाह है और उसे तिल मात्र भी किसी प्रकार का लालच नहीं ॥ २०॥ १॥
11रागु सूही बाणी स्री कबीर जीउ तथा सभना भगता की ॥
12कबीर के
13ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
14हे भाई ! दुर्लभ मानव-जन्म लेकर तूने क्या किया है?
15राम का नाम तो कभी मुख से लिया ही नहीं ॥ १॥
16राम का नाम न जपकर तू कौन-सी मति में लग गया है।
17हे अभागे ! तू मृत्यु के समय भी क्या कर रहा है।१॥ रहाउ॥
18तूने दुखों को भी सुख मानकर अपने परिवार का पोषण किया और
19अब मृत्यु के समय भी दुख ही दुख भोग रहा है॥ २॥
20अब जब यमदूतों ने तुझे गले से पकड़ लिया है तो तू ज़ोर-जोर से चिल्ला रहा है।
21कबीर जी कहते हैं कि हे भाई ! तूने पहले ही ईश्वर का स्मरण कयों नहीं किया ॥ ३॥ १ ॥
22सूही कबीर जी ॥
23जीव-रूपी कन्या मिलन के समय थर-थर कॉपती है और
24यह नहीं जानती कि उसका प्रियतम उससे क्या करेगा ॥ १॥
25उसकी जवानी रूपी रात्रि नाम-सिमरन के बिना ही बीत गई है और उसे डर है कि उसका बुढापा रूपी दिन भी यूं ही न गुजर जाए।
26उसके काले केश रूपी भेंवरे उड़ चुके हैं और सफेद केश रूपी बगुले आकर बैठ गए हैं।॥ १॥ रहाउ ॥
27कच्चे घड़े में पानी कभी नहीं रहता, वैसे ही यह शरीर है।
28जब आत्मा रूपी हंस उड़ जाता है तो शरीर मुरझा जाता है॥ २॥
29जैसे कुमारी कन्या अपना श्रृंगार करती है लेकिन
30अपने पति के बिना वह रंगरलियां नहीं मना सकती ॥ ३॥
31पति-प्रभु की प्रतीक्षा में कौआ उड़ाते हुए मेरी बाँहें थक चुकी हैं, पर पति-परमेश्वर नहीं आया।
32कबीर जी कहते हैं कि मेरी यह जीवन-कथा अब समाप्त हो गई है॥ ४ ॥ २ ॥
33सूही कबीर जीउ ॥
34अब तेरा अब इस शरीर पर अख्तियार समाप्त हो गया है और तुझे अपने कर्मों का लेखा देना पड़ेगा
35कठोर स्वभाव वाले यमदूत जीव को लेने के लिए आ गए हैं और
36वे उससे कहते हैं कि इस जगत् में आकर तूने क्या अर्जित किया है और क्या गंवाया है ?
37शीघ्र चलो, तुझे यमराज ने बुलाया है॥ १॥
38इसी हालत में चलो, यमराज ने अपनी कचहरी में बुलाया है।
39परमात्मा के दरबार का हुक्म आया है॥ १॥ रहाउ॥
40जीव कहता है कि हे यमदूतो ! मैं आप से प्रार्थना करता हूँ कि मेरी कुछ रकम गाँव में से लेनी शेष रहती है।
41में आज रात को ही वह लेन देन समाप्त कर लूंगा।
42कुछ तुम्हारे खर्च का भी प्रबंध कर लूंगा।
43सुबह की नमाज सराय में ही पढ़ लूंगा ॥ २ ॥
44साधु संगती में मिलकर जिसे हरी का रंग लग गया है वह धन्य है , वही भाग्यशाली पुरुष है।
45ऐसा व्यक्ति लोक-परलोक दोनों में सुखी रहता है।
46उसने अमूल्य जन्म पदार्थ जीत लिया है॥ ३॥
47जो व्यक्ति सचेत रहता हुआ भी अज्ञान की नींद में सोया रहा है, उसने अपना अमूल्य जन्म व्यर्थ गंवा लिया है।
48उसने जो धन संपति अर्जित की थी, उसके मरणोपरांत सब पराया हो गया है।
49कबीर जी कहते हैं कि वही व्यक्ति भूले हुए हैं,
50जो परमात्मा को भुलाकर मिट्टी में मिल गए हैं।॥ ४॥ ३॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं