सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 78 · Siree Raag · Guru Arjan Dev Ji

1जिस मोह-माया के साथ तुमने लगन लगा रखी है, यह मिथ्या है, मृत्यु के समय यह तुम्हारा साथ नहीं देगी।

2तेरी जीवन रूपी समूह रात्रि अज्ञानता के अंधेरे में बीत गई है, अब भी यदि सतिगुरु की शरण लेकर उनकी सेवा करोगे तो तेरेअंतर्मन में ज्ञान का प्रकाश उदय हो जाएगा।

3हे नानक ! जीवन रूपी रात्रि के चतुर्थ प्रहर में मृत्यु-काल निकट आ रहा है॥४॥

4हे मेरे वणजारे मित्र !जब भगवान का सन्देश आ जाता है तो प्राणी इस दुनिया को छोड़कर चल देता है। उसके किए कर्म उसके साथ जाते हैं।

5हे मेरे वणजारे मित्र ! वह एक क्षण की भी देरी नहीं करने देते। यमदूत नश्वर प्राणी को मजबूत हाथों से पकड़कर ले जाते हैं।

6प्रभु का लिखित आदेश मिलते ही प्राणी को यमदूत संसार से अलग कर देते हैं। ऐसे में मनमुखी प्राणी सदा कष्ट सहन करते हैं।

7जो प्राणी पूर्ण सतिगुरु की भरपूर सेवा करते हैं, वे परमात्मा के दरबार में सदैव सुखी रहते हैं।

8इस कलियुग में शरीर धरती रूप है। इस शरीर रूपी धरती में मनुष्य जो कर्म रूपी बीज बोता है, वह उसका वही फल प्राप्त करता है।

9हे नानक ! भगवान के भक्त उसके दरबार में सुन्दर लगते हैं और मनमुख हमेशा ही जन्म-मरण के चक्र में पड़कर भटकते रहते हैं ॥५॥१॥४ ॥

10श्रीरागु महला ४ घरु २ छंत

11ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

12यदि नवयौवन जीव-स्त्री अपने बाबुल (इहलोक) के घर में ज्ञानहीन ही रहे तो वह अपने पति-प्रभु के दर्शन कैसे कर सकती है?

13जब भगवान अपनी कृपा करता है तो वह गुरु के माध्यम से ससुराल (परलोक) के कार्य सीख लेती है।

14गुरमुख पत्नी पिया के घर के कामकाज सीखती है और सदैव ही अपने ईश्वर का चिन्तन करती है।

15यह अपनी सत्संगी सखियों में रहकर सुखी जीवन व्यतीत करती है और मरणोपरांत वह अपनी बाह घुमाती हुई अर्थात निश्चित होकर हरि के दरबार में जाती है।

16हरि-परमेश्वर के नाम का उच्चारण करने से वह धर्मराज के हिसाब-किताब से बच जाती है।

17इस तरह अपने पीहर (इहलोक) में ही ज्ञानहीन नवयौवन जीव-स्त्री अपने पति-परमेश्वर के साक्षात् दर्शन कर लेती है॥१॥

18हे मेरे बाबुल ! अब मेरा विवाह हो गया है, गुरु के उपदेश द्वारा मैंने पति-परमेश्वर को पा लिया है।

19गुरु ने मेरे अन्तर्मन से अज्ञान का अंधेरा दूर कर दिया है। गुरु ने मेरे अन्तर्मन में ज्ञान का प्रचण्ड दीपक प्रज्वलित कर दिया है।

20गुरु का प्रदान किया हुआ ज्ञान का प्रकाश होने पर अँधेरा नष्ट हो गया है और उस आलोक में हरि के नाम का अमूल्य रत्न-पदार्थ मिल गया है।

21मेरे अहंकार का रोग दूर हो गया है और मेरा दुख मिट गया है। गुरु के उपदेश अधीन अपने अहंकार को मैंने स्वयं ही निगल लिया है।

22मैंने अकालमूर्ति को अपना पति वरण कर लिया है। वह अनश्वर है और इसलिए वह जन्म और मरण से सदा ऊपर है।

23हे मेरे बाबुल ! अब मेरा विवाह हो गया है और गुरु के उपदेश अनुसार पति-परमेश्वर हरि को प्राप्त कर लिया है॥२॥

24हे मेरे बाबुल ! मेरा हरि-परमेश्वर सत्यस्वरूप है; भगवान के भक्त मिलकर भगवान की बारात में आए हैं। उनके आगमन से बारात बहुत सुन्दर लगती है।

25मैं अपने पीहर (इहलोक) में भगवान का नाम जपकर सुखपूर्वक रहती हूँ। अब मैं अपने ससुराल (परलोक) में शोभा प्राप्त कर रही हूँ।

26जिन्होंने अपने पीहर (इहलोक) में नाम-सिमरन किया होता है, उनकी ससुराल (परलोक) में बड़ी शोभा होती है।

27उनका समूचा जीवन सफल हो जाता है, जिन्होंने गुरु के उपदेशानुसार मन की तृष्णाओं पर विजय प्राप्त की है।

28ईश्वर के सन्तजनों से भेंट करके मेरा विवाह कार्य सफल हुआ है और आनन्द के स्वरूप प्रभु को मैंने पति के तौर पर पा लिया है।

29हे मेरे बाबुल ! भगवान सत्यस्वरूप है। भगवान के भक्तों के आगमन से बारात बहुत सुन्दर लगती है॥३॥

30हे मेरे बाबुल ! मुझे दहेज में हरि-प्रभु के नाम का दान दो।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं