सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 789 · Raag Soohee

1पउड़ी।

2अपना तन-मन एवं शरीर सब सौंपकर सदैव परमात्मा की स्तुति करो।

3गुरु के उपदेश द्वारा सत्य को पाया जा सकता है, जो गहन गंभीर एवं शाश्वत है ।

4परमात्मा रूपी अनमोल हीरा तन मन हृदय सब में मौजूद है।

5मेरा जन्म-मरण का दुख मिट गया है और अब मुझे आवागमन में पड़ना नहीं पड़ेगा।

6हे नानक ! परमात्मा गुणों का गहरा सागर है, तू उसके नाम का स्तुतिगान करता रह।१० ॥

7श्लोक महला १॥

8हे नानक ! यह शरीर जला दे, जिस जले हुए ने परमात्मा का नाम भुला दिया है।

9तेरे हृदय रूपी तालाब में पापों की काई अर्थात् गंदगी पड़ती जा रही है, जिसे साफ करने के लिए फिर तेरा हाथ उस तक नहीं पहुँचेगा।१॥

10महला १॥

11हे नानक ! मेरे मन के कार्य इतने धिक्कार योग्य हैं, जो गिने नहीं जा सकते।

12ओह! इनके कारण शायद मैं कितना दुख खौफ प्राप्त करूंगा। यदि परमात्मा क्षमा कर दे तो मुझे मुसीबतों का धक्का नहीं लगेगा।॥२॥

13पउड़ी।

14परमात्मा ने सच्चा विधान लागू करके सारी दुनिया में अपना सच्चा हुक्म चलाया हुआ है।

15सो वह चतुर परमपुरुष सदैव अटल है और विश्वव्यापक है।

16गुरु की कृपा से ही उसकी भक्ति होती है और उसके दरबार में पहुँचने के लिए सत्य शब्द ही परवाना है।

17उसने समूचा विश्व बनाया है और गुरु उपदेशानुसार उसके रंग का आनंद प्राप्त करो।

18यह अगम्य, अगोचर एवं अलक्ष्य है और गुरु के माध्यम से ही उस परमात्मा को जाना जाता है। ११॥

19श्लोक महला १ ॥

20हे नानक ! जीव के माल की गठरी अर्थात् उसके शुभाशुभ कर्मो का लेखा जोखा लाकर भीतर रखा जाता है।

21मालिक के दरबार में शुभ एवं अशुभ (सत्य-असत्य) कर्मों की परख की जाती है॥ १॥

22महला १॥

23कुछ लोगों के मन में बड़ी खोट एवं तन में विकार रूपी चोर होते हैं। वे दिखावे के तौर पर बड़े चाव से तीर्थों में पापों से छूटने के लिए स्नान करने जाते हैं।

24फलस्वरूप तीर्थ पर स्नान करने से उनके विकारों का एक भाग तो छूट जाता है परन्तु विकारों के दो भाग और लग जाते हैं।

25बाहर से उनकी धोती तो धुल जाती है, मगर अन्तर्मन में झूठ रूपी विष भरा रहता ।

26साधु धन्य है, यहां तक ​​कि इस तरह के स्नान के बिना, जबकि एक चोर एक चोर है, चाहे वह कितना भी स्नान करे।॥ 2 ॥

27पउड़ी।

28ईश्वर स्वयं ही सब पर अपना हुक्म चलाता है और समूचे जगत् को भिन्न-भिन्न कार्यो में लगाया हुआ है।

29उसने कुछ जीवों को अपने आप नाम-सिमरन में लगाया है और उन्होंने गुरु से सुख प्राप्त किया है।

30यह मन दसों दिशाओं में दौड़ता है, पर गुरु ने इस पर अंकुश लगाया है।

31सारी दुनिया ही नाम की अभिलाषा करती है परन्तु यह गुरु-मतानुराार ही मिलता है।

32जो ईश्वर ने भाग्य में लिख दिया है, उसे टाला नहीं जा सकता। १२ ॥

33श्लोक महला १॥

34दुनिया में उजाला करने के लिए परमात्मा ने सूर्य एवं चन्द्रमा दो दीपक बनाए हैं और साथ ही चौदह लोक रूपी दुकानें बनाई हैं।

35दुनिया में जितने भी जीव हैं, वे सभी व्यापारी हैं।

36जब दुकानें खुल गई तो व्यापार होने लग गया।

37जो भी जन्म लेकर आता है, उसने यहाँ से चले जाना है।

38यमराज रुपी दलाल जीवों के शुभाशुभ कर्मों पर मोहर लगाता जाता है।

39हे नानक ! जीवों का अर्जित नाम रूपी लाभ ही मंजूर होता हैं।

40जो जीव नाम रूपी लाभ अर्जित करके अपने घर आए हैं, उन्हें शुभकामनाएँ मिली हैं

41और उन्हें ही सत्य-नाम की बड़ाई मिली है। १॥

42महला १॥

43जब रातें काली होती हैं तो भी सफेद वस्त्रों के रंग सफेद ही रहते हैं अर्थात् दुख में भी धैर्यवान अपना धैर्य नहीं छोड़ते।

44नि:संकोच दिन सफेद होता है और गर्मी भी काफी होती है तो भी काली वस्तुओं के रंग काले ही रहते हैं अर्थात् झूठे अपना झूठ नहीं छोड़ते।

45ज्ञानहीन आदमी नासमझ ही होते हैं। मूखों की अक्ल अंधी ही होती है अर्थात् मूर्ख ज्ञानहीन ही होते हैं।

46हे नानक ! जिस पर परमात्मा की कृपा-दृष्टि नहीं होती, वह कभी शोभा का पात्र नहीं बनता ॥ २॥

47पउड़ी।

48सच्चे परमेश्वर ने स्वयं यह शरीर रूपी किला बनाया है।

49किसी को द्वैतभाव में प्रवृत्त करके पथभ्रष्ट कर देता है, जो अहम्-भावना में ही लीन रहता है।

50यह मानव जन्म दुर्लभ है परन्तु मन की मर्जी करने वाले आदमी बहुत दुखी होते हैं।

51यह सूझ उसे ही होती है, जिसे परमात्मा स्वयं सूझ देता है और जिसे सतगुरु प्रेरित करता है।

52यह समूचा जगत् परमात्मा द्वारा रचित एक खेल है जिसमें वह स्वयं ही समान रूप से व्याप्त है ॥१३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं