गुरु ग्रंथ साहिब 787 · Raag Soohee · Guru Amar Daas Ji
1मिथ्या लाल वेष में किसी ने भी प्रभु को नहीं पाया और गंवार मनमुख जीव-स्त्री माया के मोह में जलकर मर गई है।
2अपने अहंत्व को नष्ट करके सतगुरु से मिलकर जिस का लाल वेष दूर हो गया है,
3प्रभु के रंग में लीन हुआ उसका मन-तन लाल हो गया है और उसकी जीभ प्रभु के गुणगान में ही लीन रहती है।
4जो जीव-स्त्री श्रद्धा भाव का श्रृंगार करती है और मन में शब्द को बसाती है, वह सदा सुहागिन है।
5हे नानक ! जिस जीव-स्त्री ने प्रभु-कृपा द्वारा अपने घर को पा लिया है, वह पति-प्रभु को ही अपने ह्रदय में बसाकर रखती है॥ १॥
6महला ३॥
7हे जीव-स्त्री ! अपना सूहा वेष छोड़ दे और लाल श्रृंगार कर ले।
8गुरु के शब्द द्वारा प्रभु-चिंतन करने से तेरा आवागमन मिट जाएगा।
9जिसके हृदय-घर में सहज स्वभाव पति-प्रभु आ बसता है, वह जीव-स्त्री बड़ी सुन्दर एवं गुणवान है।
10हे नानक ! वही जीव-स्त्री रमण करती है, जिससे रमण करने वाला प्रभु रमण करता है॥ २॥
11पउड़ी।
12परिवार का मोह झूठा है किन्तु मूर्ख स्वेच्छाचारी इसमें ही लीन रहता है।
13वह जीवन भर अहंत्व एवं ममत्व करता हुआ ही प्राण त्याग गया है लेकिन अपने साथ कुछ भी लेकर नहीं गया।
14उसे कोई सूझ नहीं होती कि यमकाल उसके सिर पर खड़ा है, पर वह द्वैतभाव में फंसकर भटकता रहता है।
15यमकाल ने उसे अपने वश में कर लिया है और अब उसे यह सुनहरी अवसर दोबारा नहीं मिलना।
16लेकिन उसने वही कर्म किया है, जो प्रारम्भ से ही उसकी किस्मत में लिखा हुआ था ॥ ५॥
17श्लोक महला ३
18उन स्त्रियों को सती नहीं मानना चाहिए जो पति की लाश के साथ जल मरती है।
19हे नानक ! दरअसल वही स्त्रियाँ सती कहलाने की हकदार हैं, जो अपने पति के वियोग के दुख से मर जाती हैं।१॥
20महला ३ ॥
21जो स्त्रियाँ शील एवं संतोष के साथ रहती हैं, उन्हें भी सती मानना चाहिए।
22वे अपने स्वामी की सेवा करती है और नित्य प्रातः काल उठकर उनकी संभाल करती है। ॥२॥
23महला ३ ॥
24जो स्त्रियाँ पतियों के साथ अग्नि में जलकर मरती हैं,
25वे तो ही अपने तन पर दुख सहन करती हैं,यदि वे उन्हें अपना पति समझती हैं।
26हे नानक ! जो स्त्रियां उन्हें अपना पति ही नहीं समझती, उन्हें आग में जलकर सती होने की आवश्यकता नहीं।
27उनका पति चाहे जीए चाहे मरे, वे उनसे दूर से ही भाग जाती हैं।३॥
28पउड़ी।
29हे परमेश्वर ! तूने दुख-सुख साथ ही पैदा किया है और भाग्य लिख दिया है।
30नाम जितनी बड़ी देन अन्य कोई नहीं, न ही उसका कोई रूप है और न ही कोई चिन्ह है।
31नाम तो एक अक्षय खजाना है, जो गुरु के माध्यम से ही मन में बसता है।
32परमात्मा अपनी कृपा करके जिसे नाम दे देता है, वह पुन: उसका दुख-सुख का नसीब नहीं लिखता।
33जिन्होंने श्रद्धा भावना से हरि का नाम जपा है, वे मनुष्य उसमें ही मिल गए हैं।६ ।
34श्लोक महला २॥
35जिन मनुष्यों ने यह भेद जान लिया है कि उन्होंने दुनिया से चले जाना है, वे झूठे धंधों का प्रसार क्यों करें ?
36अपने ही कार्य संवारने वाले लोगों को यहाँ से चले जाने के बारे में कोई समझ नहीं है॥ १ ॥
37महला २।
38आदमी जीवन रूपी एक रात्रि के लिए धन संचित करता है, किन्तु वह सुबह होते ही दम तोड़कर चला जाता है।
39हे नानक ! मोत के बाद धन उसके साथ नहीं जाता, फिर उसे पछतावा होता है॥ २ ॥
40महला २ ॥
41जो आदमी मजबूरी में लगाया दण्ड भरता है, इसमें न कोई उसका गुण है और न ही उसका उपकार है।
42हे नानक ! वही कार्य उत्तम है, जो वह अपनी खुशी से करता है। ॥ ३॥
43महला २॥
44अपने मन के हठ से कोई भी प्रभु को अपने पक्ष में नहीं कर सकता, चाहे वह बहुत साधना करता रहे।
45हे नानक ! वही मनुष्य कामयाबी हासिल करता है, जो सच्चा प्रेम अर्पण करता है और शब्द का चिंतन करता है॥ ४॥
46पउड़ी।
47जिस परमात्मा ने कुदरत को पैदा किया है, वही उसे जानता है।
48उसने स्वयं ही सृष्टि-रचना की है और स्वयं उसे नष्ट भी कर देता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं