गुरु ग्रंथ साहिब 786 · Raag Soohee
1पउड़ी॥
2ईश्वर ने अपने हुक्म से ही सृष्टि-रचना की है और अनेक प्रकार का संसार बनाया है।
3हे सत्यस्वरूप, अलक्ष्य एवं अपार ! तेरा हुक्म जाना नहीं जा सकता कि कितना बड़ा है।
4तू कुछ जीवों को गुरु शब्द के चिंतन द्वारा अपने साथ मिला लेता है।
5जो अपने अहंत्व एवं काम, क्रोध, मोह, लोभ रूपी विकारों को त्याग देते हैं, वे सत्य में ही लीन रहते हैं और वास्तव में वही निर्मल हैं।
6जिसे तू अपने साथ मिला लेता है, वही तेरे साथ मिलता है और वही सत्यवादी है॥ २॥
7श्लोक महला ३॥
8हे सुहाग जोड़े वाली जीव-स्त्री ! दुर्मति के कारण जिनका माया से ही लगाव है, उनके लिए समूचा संसार ही लाल है।
9सारा झूठ क्षण में ऐसे नाश हो जाता है, जैसे पेड़ की छाया स्थिर नहीं रहती।
10गुरुमुख बहुत ही लाल होता है, जैसे वह मजीठ के रंग में रंगा होता है।
11जिसके मन में हरि का अमृत नाम स्थित हो गया है और उसकी अभिलाषा माया से उल्ट कर प्रभु के घर में आ गई है।
12हे नानक ! मैं अपने गुरु पर बलिहारी जाता हूँ जिसे मिलकर परमात्मा का गुणगान किया जाता है॥ १॥
13महला ३॥
14सुहाग का लाल रंग भी विकार ही है, जिससे परमात्मा नहीं पाया जा सकता।
15इस रंग को उतरते कोई देरी नहीं होती और द्वैतभाव में फँसकर जीव-स्त्री विधवा हो बैठती है।
16द्वैतभाव में फँसी हुई मूर्ख एवं नादान जीव-स्त्री लाल वेष में लोभायमान रहती है।
17यदि सच्चे शब्द द्वारा लाल रंग बना कर प्रभु भय एवं प्रेम को अपना श्रृंगार बना ले तो
18हे नानक ! वह सदा सुहागिन बनी रहती है, जो सतगुरु की रज़ा में चलती है॥ २॥
19पउड़ी॥
20स्वयंभू ईश्वर ने अपने गुणों का मूल्य स्वयं ही पाया है।
21उसका रहस्य जाना नहीं जा सकता परन्तु गुरु-शब्द द्वारा ही उसकी सूझ होती है।
22माया का मोह घोर अन्धकार है, जो द्वैतभाव में भटकाता रहता है।
23स्वेच्छाचारी को कहीं भी ठिकाना नहीं मिलता और वह बार-बार जन्मता-मरता रहता है।
24जो परमात्मा को उपयुक्त लगता है, वही होता है। सब जीव उसकी इच्छानुसार ही चलते हैं।॥ ३॥
25श्लोक महला ३॥
26लाल वेष वाली जीव रूपी कामिनी कुलक्ष्णी है, जो प्रभु को छोड़कर पराए पुरुष से प्रेम करती है।
27उसे कोई शर्म एवं संयम नहीं, वह तो सदा झूठ बोलती रहती है। वह कर्म करके ख्वार होती रहती है।
28जिसकें भाग्य में पूर्व ही शुभ लेख लिखा हुआ है, उसे पति-परमेश्वर मिल जाता है।
29वह अपना लाल वेष उतार कर गले में क्षमा रूपी श्रृंगार पहन लेती है।
30फिर वह लोक-परलोक में बहुत शोभा प्राप्त करती है और सारा संसार उसकी पूजा करता है।
31जिस जीव-स्त्री से सृजनहार प्रभु रमण करता है, वह किसी के साथ मिलाने पर भी उससे नहीं मिलती।
32हे नानक ! वह गुरुमुख जीव-स्त्री सदा सुहागिन है, जिसका पति अनश्वर प्रभु है॥ १॥
33महला १ ॥
34माया का लाल रंग रात के सपने की तरह है और डोर के बिना गले में पहने हार के बराबर है।
35जबकि गुरु से प्राप्त किया ब्रह्म-चिंतन वैसे है जैसे मजीठ का सच्चा रंग होता है।
36हे नानक ! जो जीव-स्त्री परमात्मा के प्रेम रूपी महारस में भीगी रहती है, उसकी सब बुराईयों जल कर राख हो जाती हैं॥ २ ॥
37पउड़ी॥
38अद्भुत लीला करके परमेश्वर ने स्वयं यह जगत् उत्पन्न किया है।
39उसने इसमें पाँच तत्व-हवा, आकाश, अग्नि, जल एवं पृथ्वी डाले हैं और मोह, झूठ एवं घमण्ड भी डाले हैं।
40ज्ञानहीन मनमुख जीव जन्म-मरण के चक्र में ही भटकता रहता है।
41कुछ जीवों को भगवान् स्वयं ही गुरु के माध्यम से ब्रह्म-ज्ञान प्रदान करता है।
42जिसने हरि-नाम रूपी धन पा लिया है, उन्हें ही उसने भक्ति का खजाना प्रदान किया है।॥ ४॥
43श्लोक महला ३॥
44हे सुहाग जोड़े वाली ! तू अपना लाल वेष छोड़ दे तो ही तेरा प्यार अपने पति-प्रभु से लगेगा।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं