सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 782 · Raag Soohee · Guru Arjan Dev Ji

1सोते, बैठते, खड़े होते हर वक्त हमें प्रभु का ध्यान करना चाहिए।

2वह जगत् का स्वामी गुणों का भण्डार एवं सुखों का सागर है, जो जल, धरती, गगन सर्वत्र मौजूद है।

3हे नानक ! मैंने तो की शरण ली है, उसके अतिरिक्त मेरा कोई आधार नहीं है॥ ३॥

4हे भाई ! प्रभु चरणों की सेवा करने से मेरा हृदय रूपी घर सुन्दर सरोवर एवं उपवन बन गया है।

5जब मैंने हरि के गुणों का मंगलगान किया तो मन मुग्ध हो गया और मेरे साजन-मित्र सब प्रसन्न हो गए।

6सच्चे प्रभु का गुणगान एवं ध्यान करने से मेरी सब इच्छाएँ पूरी हो गई हैं।

7गुरु के चरणों में लगकर सदैव के लिए सचेत हो गया हूँ और मन में खुशियाँ पैदा हो गई हैं।

8सुख देने वाले स्वामी प्रभु ने कृपा-दृष्टि करके मेरा लोक-परलोक संवार दिया है।

9नानक विनती करता है कि जिस परमात्मा ने हमारे जीवन एवं शरीर को सहारा दिया हुआ है, नित्य उसका नाम जपते रहना चाहिए॥ ४ ॥ ४ ॥ ७ ॥

10सूही महला ५ ॥

11हरि-नाम का ध्यान-मनन करने से भयानक संसार-सागर से पार हुआ जा सकता है।

12जो गुरु को मिलकर जहाज रूपी हरि-चरणों की आराधना करता है, वह भवसागर में से पार हो जाता है।

13जो व्यक्ति शब्द-गुरु द्वारा भवसागर में से पार हो जाता है, उसका जन्म-मरण का चक्र ही छूट जाता है।

14जो कुछ परमात्मा करता है, उसे सहर्ष भला मानना चाहिए, इससे मन सहज ही उसमें समा जाता है।

15सुखों के सागर परमेश्वर की शरण में आने से कोई दुख, भूख एवं रोग स्पर्श नहीं करता।

16हे नानक ! जो हरि का सिमरन करके उसके रंग में लीन हो जाता है, वह मन की सब चिंताएँ मिटा लेता है।१॥

17संतजनों ने ह्रदय में हरि-मंत्र वसा दिया है, इस तरह मैंने अपने साजन हरि को अपने वश में कर लिया है।

18मैंने अपना मन उसके आगे अर्पण कर दिया है और ठाकुर जी ने मुझे सबकुछ दे दिया है।

19जब उसने मुझे अपनी दासी बना लिया तो मेरी उदासी मिट गई और हरिमन्दिर में स्थिर निवास मिल गया।

20सच्चे प्रभु का सिमरन करके आनंद एवं खुशियाँ हासिल करो, कभी भी वियोग नहीं होता।

21जो जीव-स्त्री राम नाम के गुणों को जानती है, वह भाग्यवान् एवं सदैव सुहागिन है।

22हे नानक ! जो प्रभु के रंग में लीन होकर उसे स्मरण करते हैं, वे उसके प्रेम के महारस में ही भोगे रहते हैं।२॥

23हे सखी ! मेरे हृदय घर में नित्य आनंद-विनोद बना रहता है और सदैव प्रभु का स्तुतिगान किया जाता है।

24मेरे प्रभु ने स्वयं ही मेरा श्रृंगार किया है और अब मैं शोभावान् नारी बन गई हूँ।

25वह सहज स्वभाव मुझ पर कृपालु हो गया है और उसने मेरे गुण-अवगुण का ख्याल नहीं किया।

26हे सखी ! जिन्होंने राम-नाम अपने हृदय में बसा लिया है, प्रभु ने उन्हें गले से लगा लिया है।

27सारी दुनिया को अभिमान एवं मोह-माया का नशा लगा हुआ है लेकिन प्रभु ने कृपा करके इन्हें मेरे मन में से दूर कर दिया है।

28हे नानक ! मैं भवसागर से पार हो गई हूँ और मेरे सभी कार्य सम्पूर्ण हो गए हैं।॥ ३॥

29हे मेरी सखियो ! नित्य परमात्मा का गुणानुवाद करो, इस प्रकार सारे मनोरथ प्राप्त कर लो।

30साधु को मिलकर ऑकार का ध्यान करने से मेरा जन्म सफल हो गया है।

31एक प्रभु को ही जपो जो अनेक जीवों में बसा हुआ है और सर्व-मण्डलों में छाया हुआ है।

32ब्रह्म विश्वव्यापक है, यह विश्व उस ब्रह्म का ही प्रसार है, जिधर भी दृष्टि जाती है, वही दृष्टिगत हुआ है।

33वह सागर, पृथ्वी एवं आकाश में मौजूद है और कोई भी स्थान उससे खाली नहीं है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं