सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 781 · Raag Soohee · Guru Arjan Dev Ji

1हे प्रभु ! नानक पर ऐसी कृपा करो कि वह अपनी ऑखों से तेरे दर्शन कर ले॥ १॥

2हे प्रियतम प्रभु! मुझे करोड़ों ही कान दीजिए, जिनसे मैं तेरे गुण सुनता रहूँ।

3तेरा गुणगान सुनने से यह मन निर्मल हो जाता है और मृत्यु की फॉसी भी कट जाती है।

4अनश्वर हरि का सिमरन करने से यम की फॉसी फट जाती है और सारी खुशियाँ एवं ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

5दिन-रात हरि-नाम का जाप जपने से सहज ही ध्यान लग जाता है।

6प्रभु का चिंतन करके सारे दुख एवं पाप जला दिए हैं और मन की दुर्मति नाश हो गई है।

7नानक प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! मुझ पर कृपा करो ताकि तेरे गुण सुन सकूं ॥ २॥

8हे प्रभु! मेरे करोड़ों हाथ हो जाएँ और वे तेरी ही सेवा करते रहें। मेरे करोड़ों पैर हो जाएँ तो वे तेरे ही मार्ग पर चलें ।

9भवसागर में से पार होने के लिए हरि की उपासना एक नाव है, जो इस नाव पर चढ़ता है, वह पार हो जाता है।

10जिसने भी हरि नाम का सिमरन किया है, वह भवसागर में से पार हो गया है तथा उसके सारे मनोरथ पूरे हो गए हैं।

11उसके मन में से काम, क्रोध, मोह, लोभ एवं अहंकार रूपी महा विकार दूर हो गए हैं, सुख उपलब्ध हो गया है और अनहद बाजे बजते हैं।

12उसने मनोवांछित फल पा लिया है और उसकी कुदरत की कीमत अपरंपार है।

13नानक प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! मुझ पर कृपा करो ताकि मेरा मन सदैव ही तेरे मार्ग पर चले ॥ ३ ॥

14हे ईश्वर ! मेरे लिए तो यही वरदान, यही बड़ाई, यही धन,

15रस, रंग, भोग इत्यादि है कि मेरा मन तेरे चरणों में लीन रहे।

16मेरा मन उसके चरणों में लग गया है और यही प्रभु की शरण है। एक परमात्मा ही सर्वकर्ता है।

17हे दीनदयाल प्रभु ! यह सबकुछ तेरा ही दिया हुआ है और तू मेरा रखवाला है।

18हे मेरे प्रियतम ! तू सुख का सागर है, पर मैं गुणविहीन हूँ। अज्ञानता की निद्रा में सोया हुआ मेरा मन संतों की संगति करने से चेतन हो गया है।

19हे नानक ! प्रभु ने मुझ पर बड़ी कृपा की है और मेरा मन उसके चरणों से लग गया है॥ ४॥ ३॥ ६॥

20सूही महला ५ ॥

21हे भाई ! यह हरिमन्दिर हरि का नाम जपने के लिए बनाया है। इसमें संत एवं भक्तजन बैठकर हरि का गुणानुवाद करते हैं।

22वे स्वामी प्रभु का सिमरन करके अपने सर्व पापों को नाश करते हैं।

23प्रभु की उत्तम वाणी द्वारा हरि का गुणगान करके उन्होंने परमपद (मोक्ष) पा लिया है।

24प्रभु की सहज कथा मन को शांतेि देने वाली है और बड़ी मीठी है। अत: मैंने यह अकथनीय कहानी कथन की है।

25वह संयोग बड़ा शुभ था, वह मुहूर्त एवं पल भी सच्चा था, जब इस हरिमन्दिर की अटल नींव रखवाई थी।

26हे नानक ! जब प्रभु दयालु हो गया तो सब कार्य सम्पूर्ण हो गए॥ १॥

27हे भाई ! जिसके मन में परमात्मा आकर बस गया है, उसके मन में नित्य आनंददायक बाजे बजते रहते हैं।

28जिसने गुरु के माध्यम से सत्कर्म किया है, उसका भ्रम एवं झूठा भय नाश हो गए हैं।

29जब गुरु ने अनहद वाणी का बखान किया तो उसे सुन-सुनकर मन एवं तन आनंदित हो गया।

30यह सर्व सुख उसे ही हासिल हुए हैं, जिसे प्रभु ने अपना बना लिया है।

31जिसे राम नाम का रंग लग गया है, उसके घर नौ निधियों के भण्डार भरे रहते हैं।

32हे नानक ! जिस व्यक्ति के पूर्ण भाग्य हैं, उसे प्रभु कभी नहीं भूलता ॥ २॥

33हे भाई ! छत्रपति प्रभु ने मुझ पर कृपा रूपी छाया कर दी है, जिससे तृष्णा रूपी सारा ताप नाश हो गया है।

34मेरे दुखों एवं पापों का डेरा ध्वस्त हो गया है और मेरा कार्य संवर गया है।

35जब प्रभु ने हुक्म किया तो मेरी सब बलाएँ मिट गई और मुझे सत्य, धर्म एवं पुण्य फल मिल गया।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं