सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 77 · Siree Raag · Guru Raam Daas Ji

1यह धन-सम्पत्ति और मोह-माया सब झूठे हैं। जिसे अन्तकाल त्याग कर पश्चाताप करते हुए प्राणी चला जाता है।

2जिस पर ईश्वर की कृपा होती है, उसका गुरु से मिलन होता है और वह ईश्वर की उपासना में लीन हो जाता है।

3गुरु जी उद्बोधन करते हैं हे नानक ! जीवन रूपी रात्रि के तृतीय प्रहर में जो प्राणी हरि-भजन करता है, वह प्रभु में ही विलीन हो जाता है ॥ ३॥

4हे मेरे वणजारे मित्र ! जीवन रूपी रात्रि के चतुर्थ प्रहर में ईश्वर ने मृत्यु काल निकट ला दिया है।

5इसलिए हे मित्र ! अपने हाथों से पूर्ण सतिगुरु की श्रद्धापूर्वक सेवा कर, क्योंकि जीवन रूपी समूची रात्रि अब व्यतीत होती जा रही है।

6प्रतिक्षण परमेश्वर की सेवा करो, इसमें विलम्ब उचित नहीं, क्योंकि इससे तुम युग-युग के लिए अमर हो जाओगे।

7हे प्राणी ! ईश्वर के रंग में आनंद मनाओ और जन्म-मरण के दुःख को सदैव के लिए भुला दो।

8सतिगुरु एवं भगवान में कोई अन्तर मत समझो। सतिगुरु को मिलकर भगवान की भक्ति अच्छी लगती है।

9हे नानक ! जीवन रूपी रात्रि के चतुर्थ प्रहर में जो प्राणी भगवान की भक्ति करते हैं, उन भक्तों की जीवन-रात्रेि सफल हो जाती है ॥ ४॥१ ॥३ ॥

10श्रीरागु महला ५ ॥

11हे मेरे वणजारे मित्र ! जीवन रूपी रात्रि के प्रथम प्रहर में ईश्वर प्राणी की माता के उदर में डाल देता है।

12माता के उदर में ही प्रभु दस माह में उसे मनुष्य बना देता है। प्रभु उसे जीवन रूपी समय देता है और इस समय में प्राणी शुभ-अशुभ कर्म करता है।

13प्रभु यह जीवन-अवधि निर्धारित कर देता है। जीव के पूर्व जन्म के कर्मो अनुसार उसके माथे पर ऐसी किस्मत लिख दी जाती है, जैसे वह कर्म करता है।

14परमात्मा प्राणी को माता-पिता, भाई, पुत्र-पत्नी इत्यादि के संबंधों में बांध देता है।

15हरि स्वयं ही शुभ अथवा अशुभ कर्म प्राणी से करवाता है तथा प्राणी के अपने वश में कुछ नहीं।

16हे नानक ! जीवन रूपी रात्रेि के प्रथम प्रहर में भगवान प्राणी को माता के उदर में डाल देता है॥१॥

17हे मेरे वणजारे मित्र ! जीवन रूपी रात्रि के द्वितीय प्रहर में प्राणी की भरी जवानी नदी के समान काम, मोह और तृष्णा की तरंगों में बहती है।

18हे मेरे वणजारे मित्र ! अहंकार में मदमस्त होने के कारण प्राणी बुरा-भला पहचानने में असमर्थ होता है।

19प्राणी अच्छे-बुरे की पहचान नहीं करता और आगे बढ़ने का मार्ग उसके लिए अधिक कठोर है।

20वह सतिगुरु को पहचानकर उसकी सेवा में लीन नहीं होता और निर्दयी यमदूत उसके सिर पर (मृत्यु रूपी) दण्ड धारण किए खड़ा रहता है।

21हे मूर्ख मनुष्य ! जब धर्मराज तुझे पकड़कर पूछेगा? तुम उसको अपने कर्मों का क्या उत्तर दोगे?

22हे नानक ! जीवन रूपी रात्रि के द्वितीय प्रहर में प्राणी की भरी जवानी नदी के समान काम, मोह एवं तृष्णा की तरंगों में बहती है॥२॥

23हे मेरे वणजारे मित्र ! जीवन रूपी रात्रि के तृतीय प्रहर में ज्ञानहीन,मुर्ख प्राणी विषय-वासनाओं का विष संग्रह करता है।

24वह अपने पुत्र एवं पत्नी के मोह में फँसा हुआ है और उसके मन में लोभ की लहरें उठती हैं।

25मन में आकर्षक पदाथों के लोभ की लहरें विद्यमान हैं। यह ईश्वर की ओर चित्त नहीं लगाता और ईश्वर-उपासना नहीं करता।

26वह सत्संग के साथ मेल-मिलाप नहीं करता और विभिन्न योनियों के अन्दर कष्ट सहन करता है।

27जगत् के सृजनहार स्वामी को उसने विस्मृत कर दिया है और वह एक क्षण मात्र भी अपनी वृत्ति प्रभु की तरफ नहीं लगाता।

28हे नानक ! जीवन रूपी रात्रि के तृतीय प्रहर में अज्ञान में अंधा हुआ प्राणी विषय-वासनाओं का विष संचित करता रहता है।॥३॥

29हे मेरे वणजारे मित्र ! जीवन रूपी रात्रि के चतुर्थ प्रहर में मृत्यु का दिन निकट आ रहा है।

30हे मेरे वणजारे मित्र ! तू सतिगुरु की शरण लेकर ईश्वर का नाम स्मरण कर, वह परलोक में तेरा एकमात्र सहारा होगा।

31हे प्राणी ! गुरु-उपदेशानुसार नाम को स्मरण कर और अंत में यही तेरा सखा होगा।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं