सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 779 · Raag Soohee · Guru Arjan Dev Ji

1मैं साधुओं की चरण-धूलि बनकर प्रभु की आराधना करता रहता हूँ और इस प्रकार अपने प्रभु को अच्छा लगने लग गया हूँ।

2नानक प्रार्थना करता है कि हे हरि ! मुझ पर दया करो ताकिं में सदैव तेरा गुणगान करता रहूं।

3हे भाई ! गुरु से मिलकर भवसागर से पार हुआ जा सकता है।

4हरि-चरणों का जाप करने से निस्तारा हो सकता है।

5हरि-चरणों का ध्यान करने से सारे फल प्राप्त हो जाते हैं और जन्म-मरण का चक्र भी मिट जाता है।

6प्रेम-भक्ति द्वारा सहज-स्वभाव हरि को जप कर अपने प्रभु को अच्छा लगता हूँ।

7हे भाई ! तू भी उस अदृष्ट, अपरम्पार एवं पूर्ण एक परमात्मा का जाप कर, क्योंकि उसके बिना अन्य कोई बड़ा नहीं है।

8नानक विनती करता है किं गुरु ने मेरा भ्रम दूर कर दिया है। अब मैं जिधर भी देखता हूँ, उधर ही परमात्मा दिखाई देता है॥ ३॥

9हे भाई ! हरि का नाम पतितों को पावन करने वाला है।

10यह संतजनों के सब कार्य पूरे कर देता है।

11जब मैंने संत रूपी गुरु को पा लिया तो प्रभु का ही ध्यान-मनन किया, जिससे मेरी सारी मनोकामनाएँ पूरी हो गई हैं।

12मेरा अभिमान का ताप नष्ट हो गया है, अब में सदैव प्रसन्न रहता हूँ और मुझ चिरकाल से विछुड़े हुए को प्रभु मिल गया है।

13मेरे मन में बड़ी शान्ति प्राप्त हुई है और शुभकामनाएँ मिल रही हैं। अब मेरे मन से प्रभु कभी भी विस्मृत नहीं होता।

14नानक विनती करता है कि सतिगुरु ने मेरे हृदय में यह बात बसा दी है कि सदैव परमेश्वर का भजन करते रहो। ॥४॥१॥३॥

15रागु सूही छंत महला ५ घरु ३

16ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

17हे प्रभु ! तू सबका मालिक है और वैराग्यवान है। मुझ जैसी तेरी अनेक दासियों हैं।

18तू रत्नाकर सागर है, पर मैं तेरी कद्र नहीं जानती।

19तू बड़ा बुद्धिमान है, मगर मैं तेरे गुणों को नहीं जानती, हे स्वामी ! मुझ पर मेहर करो।

20अपनी कृपा-दृष्टि करो और मुझे ऐसी बुद्धि दीजिए मैं आठों प्रहर तेरा ही ध्यान करती रहूँ।

21हे जीवात्मा ! घमण्ड मत कर, सब की चरण-धूलि बन जा, तो तेरी गति हो जाएगी।

22हे भाई ! नानक का मालिक सबसे महान है और मुझ जैसी उसकी अनेक दासियों हैं।॥ १॥

23हे ईश्वर ! तू गुणों का गहरा सागर एवं गहन-गंभीर है ! तू मेरा पति है और मैं तेरी पत्नी हूँ।

24तू बहुत बड़ा है, सबसे ऊँचा है पर में बहुत छोटी सी हूँ।

25में तो कुछ भी नहीं हूँ , एक तू ही है जो स्वयं ही बड़ा चतुर है।

26है प्रभु ! तेरी निमेष मात्र अमृत दृष्टि द्वारा मुझे जीवन मिलता है और सारे रंग रस हासिल होते रहते हैं।

27में तेरे दसो दासी हूँ और तेरे ही चरणों की शरण ली है , जिससे मेरा मन प्रसन्न हो गया है और सारा शरीर फूलों खिल गया है।

28हे नानक ! ईश्वर सब जीवो मैं समाया हुआ है और उसे उपयुक्त लगता है वही करता है॥ २॥

29हे राम मुझे तुझ पर बड़ा गर्व है, तू ही मेरा बल है।

30मुझे सुरति, बुद्धि एवं चतुराई तेरी ही प्रदान की हुई है। यदि तू मुझे समझा दे तो ही में तुझे समझूँ।

31जिस पर परमात्मा की कृपा दृष्टि होती है वही उसे जानता और वही उसे पहचानता है।

32मनमुखी जीव स्त्री बहुत सारे रास्तो पर भटकती रहती है और माया के जाल में फँसी रहती है।

33जो जीव स्त्री प्रभु को अच्छी लगती है वही गुणवान है और उसने जीवन की सब खुँशियाँ हासिल की है।

34है ठाकुर ! तू ही नानक का सहारा है और तू ही नानक का सम्मान है ॥ ३ ॥

35हे राम ! में तुझ पर कुर्बान जाती हूँ , तू मेरी पर्वत रूपी ओट है।

36मैं तुझ पर लाख-लाख बार बलिहारी जाती हूँ, मेरा भृम का पर्दा खोल दिया है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं