सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 775 · Raag Soohee · Guru Raam Daas Ji

1मैंने हरि के मंगल गुण ही गाए हैं, जिहा से उसके गुणों का रस प्राप्त किया है। हे नानक ! अब मन में नाम का प्रकाश हो गया है॥ २॥

2जीव अपने अंतर्मन में मौजूद नाम रूपी रत्न का ही चिंतन करता है। गुरुमुख को परमात्मा का नाम बड़ा प्यारा लगता है।

3जिसे हरिनाम प्यारा लगता है, गुरु ने शब्द द्वारा उसका उद्धार कर दिया है और उसके अन्तर में से अज्ञान रूपी अंधेरा समाप्त कर दिया है।

4उसके हृदय में ज्ञान रूपी प्रचंड अग्नि प्रज्वलित हो गई है और प्रभु-ज्योति का आलोक हो गया है। उसके घर एवं मन्दिर सुन्दर बन गए हैं।

5उसने अपना तन एवं मन अर्पण करके शुभ गुणों का श्रृंगार किया है, जो सत्यस्वरूप प्रभु को अच्छा लगा है।

6जो प्रभु कहता है, वही वह भलीभांति करता है। हे नानक ! वह प्रभु-चरणों में लीन हो गया है॥ ३॥

7हे भाई ! प्रभु ने विवाह रचाया है और

8वह गुरु के माध्यम से विवाह करवाने आया है।

9वह विवाह करवाने आया है और जीव-स्त्री ने गुरु के माध्यम से हरी को पा लिया है। वह जीव-स्त्री प्रभु को बड़ी प्यारी लगती है।

10संतजनों ने मिलकर विवाह के मंगल गीत गाए हैं तथा श्री हरि ने स्वयं ही शुभ गुणों से अलंकृत किया है।

11इस शुभावसर पर देवते, नर एवं गंधर्व मिल कर आए हैं और अपूर्व बारात बन गई।

12हे नानक ! मैंने सच्चा प्रभु पा लिया है, जो जन्म-मरण के चक्र से मुक्त है॥ ४॥ १॥ ३॥

13रागु सूही छंत महला ४ घरु ३

14ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

15हे संतजनो ! आओ, हम गोविंद का गुणगान करें।

16गुरुमुख बनकर मिलकर रहें और हमारे हृदय-घर में अनेक प्रकार के शब्द बजते रहते हैं।

17हे प्रभु ! यह अनेक प्रकार के अनहद शब्द तेरे ही बजाए बजते हैं, तू जगत् का रचयिता है और सर्वव्यापक है।

18ऐसी कृपा करो कि मैं रात-दिन तेरा नाम जपता रहूँ, सदैव तेरी स्तुति करता रहूँ और सच्चे शब्द में अपनी वृत्ति लगाकर रखूं।

19मैं रात-दिन सहज स्वभाव तेरे रंग में लीन रहूँ और अपने हृदय में राम नाम की पूजा-अर्चना करता रहूँ।

20हे नानक ! गुरु के माध्यम से मैं एक परमात्मा को ही पहचानता हूँ और किसी अन्य को नहीं जानता॥ १॥

21वह प्रभु अन्तर्यामी है और सब जीवों में समाया हुआ है।

22जो जीव शब्द-गुरु द्वारा उसका मनन करता है, मेरा स्वामी प्रभु उसे सब में बसा हुआ नजर आता है।

23मेरा स्वामी अन्तर्यामी प्रभु सबके हृदय में मौजूद है।

24गुरु की शिक्षा द्वारा ही सत्य की प्राप्ति होती है और जीव सहज ही उसमें समा जाता है, उसके अतिरिक्त अन्य कोई समर्थ नहीं है।

25यदि प्रभु को उपयुक्त लगे तो मैं सहज ही उसका गुणानुवाद करूँ और वह स्वयं ही मुझे अपने चरणों से मिला ले।

26हे नानक ! शब्द-गुरु द्वारा उस प्रभु की सूझ होती है और रात-दिन उसके नाम का भजन होता है॥ २॥

27यह जगत् ऐसा सागर है, जिसमें से पार होना बहुत कठिन है और मन की मर्जी अनुसार चलने वाला जीव तो इससे पार ही नहीं हो सकता।

28ऐसे जीव के अन्तर्मन में अभिमान, ममत्व, काम, क्रोध एवं चतुराई ही भरे होते हैं।

29अन्तर्मन में चतुराई होने के कारण उसका जीवन सफल नहीं होता और अपना जीवन व्यर्थ ही गंवा देता है।

30वह मृत्यु के मार्ग में बहुत दुख प्राप्त करता है, मृत्यु से चोटें खाता है तथा अन्तिम समय जगत् को छोड़ता हुआ पछताता है।

31परमात्मा के नाम के अतिरिक्त पुत्र, परिवार, सुपुत्र एवं भाई इत्यादि कोई उसका साथी नहीं बना।

32हे नानक ! यह मोह-माया का प्रसार आगे परलोक में जीव के साथ नहीं जाता॥ ३॥

33मेरा सतिगुरु नाम का दाता है, मैं उससे पूछता हूँ केि इस दुस्तर संसार-सागर से कैसे पार हुआ जा सकता है ?

34सतिगुरु की रजानुसार चलो, फिर जीते-जी मरा जाता है अर्थात् अहंत्व समाप्त हो जाता है।

35यदि मनुष्य जीते-जी मर जाए अर्थात् अपना अहम् समाप्त कर दे तो इस संसार-सागर से पार हुआ जा सकता है और वह गुरु के माध्यम से नाम में ही विलीन हो जाता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं