सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 774 · Raag Soohee · Guru Raam Daas Ji

1नानक जी कहते हैं कि पहले फेरे अर्थात् भाँवर द्वारा विवाह का आरंभ कार्य रचाया है॥ १॥

2मैं राम पर कुर्बान हूँ। जब (हरि के) विवाह का दूसरा फेरा (भॉवर) करवाया गया तो उसने जीव-स्त्री को सतगुरु से मिला दिया।

3जीव-स्त्री का मन प्रभु के भय से निर्भय हो गया है और उसकी अहंत्व रूपी मैल दूर हो गई है।

4जब उसके मन में निर्मल प्रभु का भय उत्पन्न हो गया तो उसने हरि का गुणगान किया। अब वह हरि को आसपास ही देखती है।

5आत्मा में ही परमात्मा है, स्वामी प्रभु सर्वव्यापक है।

6उस जीव-स्त्री को एक प्रभु ही अपने हृदय एवं बाहर दुनिया में बसता दिखाई देता है। हरि-भक्तों ने मिलकर जीव-स्त्री के विवाह की खुशी के गीत गाए हैं।

7हे नानक ! जब दूसरा फेरा सम्पन्न करवाया गया तो जीव-स्त्री के हृदय में आनंद शब्द गूंजने लगा ॥ २॥

8हे राम ! मैं तुझ पर कुर्बान हूँ। जब (हरि के) विवाह का तीसरा फेरा करवाया गया तो जीव-स्त्री के वैरागी मन में चाव पैदा हो गया।

9जब भाग्यशाली संतजनों से उसका मेल हुआ तो उसने हरि को पा लिया।

10जब उसने निर्मल हरि को पा लिया तो ही उसने हरि का गुणगान किया। उसने अपने मुख से हरि की वाणी उच्चरित की।

11भाग्यवान जीव-स्त्री ने उन संतजनों से मिलकर अपना पति-प्रभु पा लिया और संतजन हरि की अकथनीय कहानी कथन करते रहते हैं।

12उस जीव-स्त्री के हृदय में हरि के नाम की ध्वनि पैदा हो गई है। वह हरि का जाप करती रहती है क्योंकि उसके माथे पर ऐसा भाग्य लिखा हुआ था।

13नानक कहते हैं कि तीसरे फेरे में जीव-स्त्री के मन में वैराग्य उत्पन्न हो जाता है।॥ ३॥

14हे राम ! मैं तुझ पर बलिहारी हूँ। जब (हरि के) विवाह का चौथा फेरा हुआ तो जीव-स्त्री के मन में सहज उत्पन्न हो गया और उसने अपने परमात्मा को पा लिया।

15उसे गुरु द्वारा सहज स्वभाव ही प्रभु मिला है, जिसने उसके मन एवं तन में हरि मीठा लगा दिया है।

16गुरु ने जीव-स्त्री को हरि मीठा लगा दिया है और यह बात मेरे प्रभु को अच्छी लगी है।जीव-स्त्री रात-दिन हरि में ध्यानरथ रहती है।

17उसने मनोवांछित स्वामी पा लिया है और उसे हरि नाम की शुभ-कामनाएँ मिल रही हैं।

18स्वामी प्रभु ने जीव-स्त्री से अपना विवाह करवाया है। जीव-स्त्री नाम द्वारा अपने हृदय में बहुत प्रसन्न रहती है।

19नानक कहते हैं, जब विवाह का चौथा फेरा संपन्न करवाया गया तो जीव-स्त्री ने अविनाशी प्रभु को पा लिया ॥ ४॥ २॥

20ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

21रागु सूही छंत महला ४ घरु २ ॥

22गुरु के सान्निध्य में हरि के ही गुण गाए हैं और

23हृदय एवं जिह्मा द्वारा उस महारस का ही आनंद लिया है।

24जिसने अपनी जिह्मा से गुणों का आनंद लिया है, वही मेरे प्रभु को भा गया है और वह सहज स्वभाव ही प्रभु से मिल गया है।

25वह प्रतिदिन स्वादिष्ट पदार्थ सेवन करता है, सुख की नीद सोता है और शब्द में सुरति लगाकर रखता है।

26पूर्ण गुरु की प्राप्ति अहोभाग्य से ही होती है और फिर जीव रात-दिन परमात्मा के नाम का मनन करता रहता है।

27हे नानक ! जगत् का जीवन प्रभु उसे सहज स्वभाव ही मिल गया है और अब वह शून्यावस्था में शब्द में विलीन हुआ रहता है॥ १॥

28प्रभु ने मुझे संतों की संगति में मिला दिया है और अब हरि-नाम रूपी सरोवर में स्नान करता रहता हूँ।

29मैंने नाम रूपी निर्मल जल में स्नान करके अपने पापों की मैल दूर कर दी है और मेरा शरीर पवित्र हो गया है।

30मेरी दुर्मति रूपी मैल निवृत्त हो गई है, मेरा भ्रम भाग गया है और अहंत्व की पीड़ा भी नाश हो गई है।

31प्रभु की करुणा-दृष्टि से मुझे सत्संगति की प्राप्ति हो गई है और मेरा आत्मस्वरूप में निवास हो गया है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं