गुरु ग्रंथ साहिब 772 · Raag Soohee · Guru Amar Daas Ji
1हे नानक ! जिस जीव-स्त्री ने अपना चित्त परमात्मा से लगाया है, वह उसके रंग में रत हुई रमण करती रहती है॥ ३॥
2हे भाई ! जब प्यारा साजन मिला तो जीव-स्त्री के मन में बड़ा सुख उत्पन्न हुआ।
3गुरु-मतानुसार उसका मन निर्मल हुआ तो उसने हरि नाम को अपने हृदय में बसा लिया।
4हरि-नाम को अपने हृदय में बसाकर उसने अपना कार्य संवार लिया और गुरु-मतानुसार उसने हरि को जान लिया।
5उस प्रियतम-प्रभु ने मेरा मन मोह लिया है और मैंने उस कर्म विधाता को पा लिया है।
6सतिगुरु की सेवा करके मैंने सदैव सुख पा लिया है और प्रभु मेरे मन में बस गया है।
7हे नानक ! गुरु ने मुझे अपने साथ मिला लिया है और गुरु के शब्द द्वारा मैंने अपना जीवन-कार्य संवार लिया है॥ ४॥ ५ ॥ ६॥
8सूही महला ३ ॥
9राम का नाम ही मंगलगान है और गुरु के शब्द द्वारा ही इसका चिंतन किया जाता है।
10गुरुमुख का मन एवं तन इससे भीग जाता है और राम नाम ही उसे प्यारा लगता है।
11गुरुमुख को राम नाम ही प्यारा लगता है और वह अपने समूचे वंश का उद्धार कर देता है। वह अपने मुंह से राम नाम की वाणी बोलता रहता है।
12उसका जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो गया है और उसने सुख प्राप्त कर लिया है। उसके हृदय-घर में अनहद शब्द गूंजता रहता है, जिसमें उसकी सुरति लीन हुई रहती है।
13हे नानक ! प्रभु ने उस पर कृपा की है और उसने एक परमात्मा को पा लिया है।
14राम का नाम ही मंगलगान है और गुरु के शब्द द्वारा ही इसका चिंतन किया जाता है॥ १॥
15हे भाई ! मैं बहुत छोटा हूँ और प्रभु अत्यंत ऊँचा है, उसे कैंसे मिला जा सकता है,
16गुरु ने कृपा करके सहज स्वभाव हरि के शब्द में मिला दिया है।
17मैं अपने अहंत्व को दूर करके सहज स्वभाव ही शब्द द्वारा हरि से रमण करती रहती हूँ।
18जब प्रभु मुझे अच्छा लगने लग गया तो मेरी हृदय रूपी सेज सुखदायक बन गई और मैं हरि-नाम में विलीन हुई रहती हूँ।
19हे नानक ! वही जीव-स्त्री सुहागिन एवं भाग्यवान् है जो अपने सतिगुरु की रज़ानुसार चलती है।
20हे भाई ! मैं बहुत छोटी हूँ और प्रभु सर्वोपरि है, उसे कैसे मिला जा सकता है।२ ।
21हे भाई ! सबका मालिक एक प्रभु ही सब जीवों के हृदय में मौजूद है।
22कई जीवों को प्रभु दूर बसता लगता है और किसी को अपने मन का आसरा लगता है।
23सृजनहार परमेश्वर कई जीवों के मन का आधार बना हुआ है और भाग्यवान जीव गुरु को पा लेते हैं।
24सबके हृदय में एक प्रभु ही मौजूद है, जो सबका मालिक है एवं गुरु ने उस अदृष्ट परमात्मा के दर्शन करवाए हैं।
25हें नानक ! उन्हें सहज ही आनंद उत्पन्न हो गया है, उनका मन तृप्त हो गया है और वे ब्रह्म का चिंतन करते रहते हैं।॥
26सभी जीवो में, प्रत्येक हृदय में वही एक प्रभु राम बसता है। ॥ ३॥
27हे भाई ! जो जीव नाम के दाता गुरु की सेवा करता है, वह हरि-नाम में ही समाया रहता है।
28हे हरि ! मुझे पूर्ण गुरु की चरण-धूलि दीजिए, जिसने मुझ पापी को मुक्त करवा दिया है।
29उसने मुझ पापी को मुक्त करवाया है, मैंने अभिमान को दूर करके अपने आत्मस्वरूप में निवास पा लिया है।
30गुरु की शिक्षा द्वारा मेरे मन में प्रभु-नाम का प्रकाश हो गया है, मुझे विवेक बुद्धि मिल गई है और अब जीवन रूपी रात्रि सुखद ही व्यतीत होती है।
31हे नानक ! हरिनाम जपने से मन में दिन-रात आनंद बना रहता और मुझे हरि ही मीठा लगता है।
32हे भाई ! नाम के दाता गुरु की सेवा करने वाला जीव हरि में ही समाया रहता है॥ ४ ॥ ६ ॥ ७ ॥ ५ ॥ ७ ॥ १२ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं