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गुरु ग्रंथ साहिब 771 · Raag Soohee · Guru Amar Daas Ji

1हे हरि ! जो जीव तेरे गुण गाते रहते हैं, वे सहज ही समाए रहते हैं और शब्द-गुरु द्वारा तूने साथ मिला लिया है।

2हे नानक ! उनका जीवन सफल हो गया है, जिन्हें सतगुरु ने हरि के मार्ग पर लगा दिया है॥ २॥

3हे भाई ! जिन्हें संतों की संगति मिल गई है, वे हरी नाम में लीन हुए रहते है।

4गुरु के शब्द द्वारा वे सदा के लिए जीवनमुक्त हो गए है और हरि के नाम में अपनी लो लगाकर रखते है।

5गुरु ने जिन्हें सत्संगति में मिलाकर प्रभु से मिला दिया है, वे हमेशा हरि-नाम में ही चित्त लगाकर रखते हैं और उनका मन हरि में ही मग्न रहता हैं।

6उन्होंने सुखदाता प्रभु को पा लिया है और उनका मोह दूर हो गया है, वे दिन-रात नाम-सिमरन ही करते रहते हैं।

7गुरु के शब्द द्वारा उनका मन सहज ही मग्न रहता है और वे हरि-नाम को अपने मन में बसा लेते हैं।

8हे नानक ! जो व्यक्ति सतगुरु की सेवा करके प्रभु में समाए रहते हैं, उनके हृदय-घर में सदैव हर्षोल्लास बना रहता है॥ ३॥

9सतिगुरु के बिना सारा जगत् भ्रम में फँसकर भूला हुआ है और किसी ने हरि का निवास नहीं पाया।

10लेकिन परमात्मा ने कुछ जीवों को गुरु से मिलाकर अपने साथ मिला लिया है और उनके दुख दूर हो गए हैं।

11जब परमात्मा के मन को उपयुक्त लगा तो उसने उनके दुख समाप्त कर दिए और अब वे उसके गुणगान एवं रंग में ही मग्न रहते हैं।

12हरि के भक्तजन सदैव निर्मल बने रहते हैं और वे युग-युग सदा के लिए विख्यात हो जाते हैं।

13वह सच्ची भक्ति करते हैं और सत्य के दरबार में प्रशंसा के पात्र बनते हैं। फिर सत्यस्वरूप परमात्मा उनके हृदय में ही होता है।

14हे नानक ! परमात्मा का स्तुतिगान सत्य है, वह सदैव सत्य है, उसकी वाणी भी सत्य है और शब्द से ही सुख उपलब्ध होता है ॥ ४ ॥ ४ ॥ ५ ॥

15सूही महला ३ ॥

16हे कमसिन जीव-स्त्री ! यदि तू अपने हरि रूपी वर को पाना चाहती है तो तुझे गुरु के चरणों में चित्त लगाना चाहिए।

17तू सदा सुहागिन बनी रहेगी, क्योंकि परमात्मा अनश्वर है।

18हरि जन्मता-मरता नहीं, वही जीव-स्त्री पति-प्रभु को प्यारी लगती है जो गुरु के प्रेम द्वारा सहज स्वभाव ही लीन रहती है।

19वह सत्य एवं संयम द्वारा सदैव निर्मल बनी रहती है और गुरु के शब्द द्वारा सत्य का ही श्रृंगार करती है।

20मेरा प्रभु सत्य है, वह सदैव शाश्वत है, जिसने स्वयं ही खुद को पैदा किया है अर्थात् वह स्वयंभू है।

21हे नानक ! जिस जीव-स्त्री ने गुरु के चरणों में चित्त लगाया है, वह सदैव अपने पति-प्रभु के साथ रमण करती है॥ १॥

22हे भाई ! कमसिन जीव-स्त्री ने अपना पति-प्रभु पा लिया है और वह सहज ही मग्न हुई रहती है।

23गुरु की शिक्षा द्वारा उसके मन में आनंद उत्पन्न हो गया है और उसके तन में थोड़ी-सी भी अहंत्व रूपी मेल नहीं रही।

24उसके तन में किंचित मात्र भी मैल नहीं रही और वह प्रभु में ही मग्न रहती है। मेरे प्रभु ने उसे गुरु के सम्पर्क में अपने साथ मिला लिया है।

25वह अपने मन में से अहंत्व को दूर करके रात-दिन प्रभु के साथ रमण करती रहती है।

26उसने अपने प्रभु को गुरु की शिक्षा द्वारा पाया है। गुरु ने सहज ही पति-प्रभु से उसे मिलाया है और अब वह प्रियतम में ही मग्न रहती है।

27हे नानक ! जिस जीव-स्त्री को नाम रूपी बड़ाई मिल जाती है, वह रंग में मग्न हुई अपने पति-प्रभु से ही रमण करती रहती है।॥ २॥

28अपने पति-प्रभु का महल उसने ही हासिल किया है, जो जीव-स्त्री प्रेमपूर्वक अपने प्रभु का चिंतन करती रहती है।

29जिस जीव-स्त्री ने अपने मन में से अपना अहंत्व दूर कर दिया है, उसने अपने पति को पा लिया है जो अत्यंत निर्मल एवं सबका दाता है।

30जब प्रभु को भला लगा तो जीव-स्त्री ने अन्तर्मन से अपने मोह को दूर कर दिया। वह जीव-रूपी कामिनी अपने प्रभु के मन को अच्छी लगने लगी।

31वह रात-दिन सत्य का गुणगान करती रहती है और प्रभु की अकथनीय कहानी कथन करती रहती है।

32सतियुग, त्रैता, द्वापर एवं कलियुग-इन चारों युगों में एक सच्चा प्रभु ही मौजूद है लेकिन गुरु के बिना उसे किसी ने भी प्राप्त नहीं किया।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं