सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 766 · Raag Soohee · Guru Nanak Dev Ji

1यदि सज्जनों के साथ मिलकर गुणों की भागीदारी की जाए तो ही अपने अवगुणों को छोड़कर सन्मार्ग पर चला जाता है।

2जो व्यक्ति शुभ गुणों को अपना श्रृंगार बनाकर मन के कोमलता रूपी वस्त्र पहनता है, वह कामादिक विकारों को पछाड़ कर जीवन रूपी संग्राम जीत लेता है।

3ऐसा व्यक्ति जहाँ भी जाकर बैठता है, वह शुभ वचन बोलता है और अवगुणों को छांटकर नाम रूपी अमृत पीता रहता है।

4यदि जीव के पास गुण रूपी सुगन्धियों का डिब्बा हो तो उसे गुण रूपी सुगन्धि लेते रहना चाहिए॥ ३॥

5ईश्वर स्वयं ही सबकुछ करता है, फिर उसके सिवा किसे कहा जाए, क्योंकि उसके अलावा अन्य कोई कुछ कर ही नहीं सकता।

6उसे शिकायत करने तो ही जाएँ, यदि उसने भूल की हो।

7यदि वह भूला हुआ हो तो ही जाकर शिकायत करने जाएँ। जगत् का रचयिता कोई भूल नहीं करता।

8वह जीवों की प्रार्थना सुनता एवं उनके किए कार्यों को देखता है।

9वह बिना कहे और बिना मॉगे ही जीवों को दान देता रहता है और एक वही सत्य है।

10जब वह स्वयं ही सबकुछ करता है, फिर उसके अलावा किसे कहा जाए, क्योंकि उसके अतिरिक्त अन्य कोई कुछ भी नहीं कर सकता ॥ ४॥ १॥ ४॥

11सूही महला १ ॥

12प्रभु की भक्ति में लीन मेरा मन उसके ही गुण गाता है और वही मेरे मन को भाता है।

13गुरु ने मुझे सत्य (नाम) की सीढी दी है, जिससे मुझे सच्चा सुख हासिल होता है।

14इससे मन को सहज सुख मिलता है, सत्य ही भाता है और सत्य की प्राप्ति वाली बुद्धि कैसे टल सकती है ?

15स्नान, दान-पुण्य, सुज्ञान एवं तीर्थ-स्नान से उस परमात्मा को कैसे खुश किया जा सकता है, जो स्वयं ही अछल है।

16मेरे मन में से धोखा, मोह एवं विषय-विकार सब नाश हो गए हैं। अब मेरे मन में झूठ, कपट एवं दुविधा भी नहीं रही।

17प्रभु की भक्ति में लीन मेरा मन उसका ही गुणगान करता रहता है और वही मेरे मन को भाता है॥ १॥

18जिसने इस विश्व की रचना की है, उस परमात्मा की स्तुति करते रहना चाहिए।

19आदमी के मन में अहंत्व रूपी मैल लगी हुई है और उसका मन मैला हो जाता है। किसी विरले पुरुष ने ही नाम रूपी अमृत पान किया है।

20मैंने नाम रूपी अमृत मंथन करके पान किया है और अपना यह मन गुरु को सौंप दिया है। नाम का यह मूल्य मैंने गुरु से करवाया है।

21जब मैंने अपना मन सत्य के साथ लगाया तो सहज ही अपने प्रभु को पहचान लिया।

22मैं उसके चरणों में लगकर उसके गुण तो ही गाऊँ यदि मैं उसे अच्छा लगने लगूं। मैं पराया बनकर उसे कैसे मिल सकता हूँ।

23जिसने यह जगत् उत्पन्न किया है, उस परमात्मा की स्तुति करनी चाहिए॥ २॥

24हे भाई ! जब परमात्मा स्वयं ही मेरे हृदय में आकर बस गया तो सबकुछ मिल गया है। अब मेरा जन्म-मरण भी छूट गया है।

25अब मेरा मन मेरे प्रियतम से संतुष्ट हो गया है और हरि के प्रेम में रंग गया है।

26मालिक के रंग में रंगा हुआ मेरा मन उस सत्य की ही बातें करता रहता है। जिसने वीर्य रूपी जल से शरीर रूपी दुर्ग बना दिया है।

27परमात्मा गगन, वायु , अग्नि, जल एवं पृथ्वी-इन पाँच तत्वों का नायक है जो स्वयं ही स्रष्टा है और जिसने आत्मा के निवास हेतु मानव-शरीर की रचना की है।

28हे प्यारे प्रभु ! तू मेरी विनती सुन, मैं अवगुणों से हुआ पापी जीव हूँ। जो जीव तुझे अच्छा लगता है, वह सच्चा बन जाता है।

29जिसकी बुद्धि सत्य स्वरुप हो जाती है, उसका जन्म-मरण नहीं होता ॥ ३ ॥

30मुझे अपनी ऑखों में वैसा ही सुरमा डालना होगा, जैसा मेरे प्रभु को अच्छा लगे।

31यदि वह स्वयं मुझे ज्ञान देता है, तो ही मैं समझती, सूझती एवं जानती हूँ।

32वह स्वयं ही मुझे ज्ञान करवाता है और मुझे सन्मार्ग लगाता है और मेरे मन को अपनी ओर प्रेरित करता है।

33वह स्वयं ही मुझसे कर्म-सुकर्म करवाता है, उसका मूल्यांकन कौन कर सकता है ?

34में किसी तंत्र, मंत्र एवं पाखण्ड को नहीं जानती और राम को अपने हृदय में बसाकर मेरा मन प्रसन्न हो गया है।

35जो गुरु के शब्द द्वारा सत्य को जान लेता है, नाम रूपी सुरमे का उसे ही ज्ञान होता है॥ ४॥

36यदि साजन संत मेरे अपने बन जाएँ तो मैं पराए घर क्यों जाऊँ ?

37मेरे साजन संत सत्य में ही मग्न रहते हैं और सत्य उनके साथ उनके मन में ही वसता है।

38मेरे साजन मन में ही रमण करते हैं और यही उनका कर्म-धर्म है। उन्हें परमात्मा का सच्चा-नाम ही भाया है और यही उनका अड़सठ तीर्थों का स्नान, दान-पुण्य एवं पूजा है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं