सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 765 · Raag Soohee · Guru Nanak Dev Ji

1सब जीवों में तेरी ही ज्योति है और मैंने जान लिया है कि वह ज्योति तू ही है। तू मुझे सहज-स्वभाव ही मिला है।

2हे नानक ! मैं अपने प्रभु पर बलिहारी जाती हूँ और वह सत्य नाम द्वारा मेरे हृदय-घर में आया है॥ १॥

3जब प्रियतम प्रभु हृदय-घर में आया तो जीव-स्त्री बहुत प्रसून्न हुई।

4सच्चे शब्द द्वारा हरि ने उसे मोह लिया है और अपने ठाकुर जी को देखकर वह फूल की तरह खिल गयी है।

5जब प्रेम में रंगे हुए प्रभु ने रमण किया तो हां उसके गुणों से मुग्ध हो गयी और बहुत प्रसन्न हुई।

6पूर्ण पुरुष विधाता ने उसके अवगुणो को नाश करे उसका हृदय घर गुणों से बसा दिया है।

7काम, क्रोध, लोभ, मोह, एवं अहंकार, रूपी चोरों को मारकर वह जीव-स्त्री प्रभु-चरणों में बस गई है।

8हे नानक ! राम नाम ने उसे भवसागर से पार कर दिया है और गुरु उपदेश द्वारा अपने प्यारे प्रभु को मिल गई है॥ २॥

9हे भाई ! नवयौवना जीव-स्त्री ने अपने पति-प्रभु को पा लिया है और उसकी आशा एवं अभिलाषा पूरी हो गई है।

10उसके पति -प्रभु ने उससे रमण किया है और अब वह शब्द में लीन हुई रहती है।

11सर्वव्यापक प्रभु उससे दूर नहीं जाता, वह प्रत्येक शरीर में मौजूद है और सब जीव-स्त्रियाँ उसकी पत्नियां हैं।

12वह स्वयं ही रसिया है, स्वयं ही रमण करता है और जैसे ही उसकी बड़ाई है।

13परमात्मा अमर, अटल, अमूल्य एवं अपार है और उस सत्यस्वरूप को पूर्ण गुरु द्वारा ही पाया जाता है।

14हे नानक ! परमात्मा स्वयं ही अपने साथ जीव-स्त्री के मिलाप का संयोग बनाने वाला है। जब वह अपनी कृपा-दृष्टि करता है तो ही वह प्रभु में अपनी सुरति लगाती है॥ ३॥

15मेरा पति-प्रभु एक ऊँचे महल में रहता है और वह तीनों लोकों का बादशाह है।

16मैं उसके गुणों को देखकर चकित हो गई हूँ और मेरे मन में अनहद शब्द गूंज रहा है।

17मैंने यह शुभ-कर्म किया है कि मैंने शब्द का चिंतन किया है और मुझे सत्य के दरबार में जाने के लिए राम नाम रूपी परवाना मिल गया है।

18खोटे व्यक्तियों को नाम के बिना प्रभु के दरबार में कोई स्थान नहीं मिलता। प्रभु को नाम रूपी रत्न ही स्वीकार होता है।

19जिस जीव-स्त्री की मति एवं प्रतिष्ठा पूर्ण है एवं पूर्ण नाम का परवाना है, वह जन्म एवं मृत्यु के चक्र से रहित है।

20हे नानक ! जो जीव-स्त्री गुरुमुख बनकर अपने आत्मस्वरूप को पहचान लेती है, वह अविनाशी प्रभु का रूप ही बन जाती है॥ ४ ॥ १॥ ३ ॥

21ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

22रागु सूही छंत महला १ घरु ४ ॥

23जिस परमात्मा ने यह जगत् उत्पन्न किया है, उसने ही इसकी देखभाल की है, और उसने ही सब जीवों को सांसारिक धंधों में लगाया है।

24हे मालिक ! तेरे (नाम रूपी) दान द्वारा मेरे हृदय में प्रकाश हो गया है और मेरे तन में चन्द्रमा रूपी दीपक प्रज्वलित हो गया है।

25प्रभु की कृपा से चन्द्रमा रूपी दीपक प्रज्वलित होने से अब मेरे हृदय में से दुख एवं अज्ञानता का अंधेरा दूर हो गया है।

26गुणों की बारात दुल्हे के साथ ही सुन्दर लगती है, जिसने मन को मुग्ध करने वाली दुल्हन को परख कर लिया है।

27परमात्मा रूपी दुल्हा जीव-रूपी दुल्हन से विवाह करने के लिए पाँच प्रकार की ध्वनियों वाले बाजों सहित बारात लेकर आया है और बड़ी धूमधाम से विवाह हुआ है।

28जिस परमात्मा ने यह संसार उत्पन्न किया है, उसने ही इसकी देखभाल की है और सब को सांसारिक धंधों में प्रवृत केिया है॥ १॥

29हे भाई ! मैं अपने उन सज्जनों एवं मित्रों पर बलिहारी जाता हूँ, जिनका जीवन-आचरण संसार से अलग है।

30मेरा यह तन जिनसे जुड़ा हुआ है, मैंने उनका मन स्वयं ले लिया है और अपना मन उन्हें दे दिया है।

31वे सज्जन मुझे क्यों विस्मृत हों, जिनसे मैंने आदर लिया है।

32जिनके दिखाई देने से मेरे मन में हर्षोल्लास उत्पन्न होता है, में उन्हें पकड़कर अपने दिल से लगाकर रखूं।

33मेरे सज्जनों में कोई भी अवगुण नहीं है, अपितु सदैव सर्वगुण ही रहते हैं।

34मैं अपने सज्जनों एवं मित्रों पर बलिहारी हूँ जो जगत् की मोह-माया से परे हैं॥ २ ॥

35यदि जीव के पास गुण रूपी सुगंधियों का डिब्बा हो तो उसे उसमें से सुगन्धि लेते रहना चाहिए।

36यदि उसके सज्जनों के पास गुण हो तो उसे उनसे मिलकर उनके साथ गुणों की भागीदारी करनी चाहिए।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं