गुरु ग्रंथ साहिब 761 · Raag Soohee · Guru Arjan Dev Ji
1निरंकार प्रभु मेरे मन में आ कर बस गया है औरअब मेरा जन्म-मरण मिट गया है।
2उस सर्वश्रेष्ठ, अगम्य एवं अपरंपार प्रभु का अंत नहीं पाया जा सकता।
3जिस इन्सान को अपना प्रभु ही भूल जाता है, वह लाखों बार जन्मता एवं मरता है॥ ६॥
4जिनके मन में वह स्वयं आकर बस जाता है, उनका अपने प्रियतम प्रभु से सच्चा प्रेम बन जाता है।
5जो व्यक्ति उनकी संगत में रहते हैं, वह उनके साथ गुणों की भागीदारी कर लेते हैं और आठ प्रहर प्रभु को ही जपते रहते हैं।
6परमेश्वर के रंग में रंगकर उनके सारे दुख-संताप नाश हो जाते हैं।॥ ७॥
7हे ईश्वर ! तू जगत् का रचयिता है और सबकुछ करने में परिपूर्ण है। तू ही एक है और तेरे रूप अनेक हैं।
8तू सर्वकला समर्थ है और तू सब में बसा हुआ है। तू ही जीवों को बुद्धि एवं ज्ञान देने वाला है।
9हे नानक ! प्रभु ही भक्तजनों का अवलम्ब है और वे सदा ही उसका नाम जपते रहते हैं।॥ ८॥ १॥ ३॥
10रागु सूही महला ५ असटपदीआ घरु १० काफी
11ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
12हे प्रभु ! यदि मुझ से कोई भूल चूक भी हो गई है तो भी मैं तेरी ही कहलाती हूँ।
13जिन जीव-स्त्रियों का प्रेम किसी दूसरे से लगा हुआ है तो वे परित्यक्ताएँ बड़ी दुखी होकर मरती हैं॥ १॥
14हे मेरी सखी ! मैं अपने पति-प्रभु का साथ कभी भी नहीं छोडूंगी।
15वह मेरा प्यारा लाल सदैव ही रंगीला है और मुझे उसका ही सहारा है॥ ॥१॥ रहाउ॥
16हे प्रभु जी ! एक तू ही मेरा सज्जन है और तू ही मेरा संबंधी है। मुझे तुझ पर बहुत गर्व है।
17तू ही मुझ जैसी मानहीन का सम्मान है। जब तू मेरे हृदय-घर में आ बसता है तो मुझे बड़ा सुख प्राप्त होता है॥ २॥
18हे कृपानिधान ! यदि तू मुझ पर प्रसन्न हो गया है तो तू मुझे कोई अन्य मत दिखा।
19मैंने तुझ से यही देन प्राप्त की है और मैं तुझे नित्य ही संभाल कर रखती हूँ॥ ३॥
20तू मेरे नयनों को अपने दर्शन दिखा, में अपने पैरों को तेरे मार्ग पर चलाऊँ।
21यदि गुरु मुझ पर कृपालु हो जाए तो मैं उससे अपने कानों से तेरी कहानियाँ सुनूं ॥ ४॥
22हे प्रिय ! दुनिया में लाखों-करोड़ों कितने ही बड़े-बड़े महापुरुष हैं लेकिन वे सारे ही तेरे एक रोम के बराबर भी नहीं पहुँचते।
23तू बादशाहों का बादशाह है, मैं तेरे गुण व्यक्त नहीं कर सकती ॥ ५॥
24हे प्रभु ! असंख्य सखियाँ तेरी दासियों हैं, वे सब मुझ से एक से बढ़कर एक बहुत सुन्दर हैं।
25अपनी कृपा-दृष्टि करके थोड़ा-सा मेरी तरफ देख और मुझे अपने दर्शन करवा दे ताकि मैं भी आनंद प्राप्त कर सकूं॥ ६॥
26जिस प्रभु को को देखने से मन को धीरज होता है और मेरे पाप दूर हो जाते हैं,
27हे मेरी माँ ! वह मुझे क्यों भूलें, जो सारे जगत् में बसा हुआ है॥ ७ ॥
28जब में विनम्र होकर उसके द्वार पर नतमस्तक हो गई तो वह मुझे सहज स्वाभाव ही मिल गया।
29हे नानक ! संतों की मदद से मैंने उसे पा लिया है जैसे पूर्व ही मेरे भाग्य में ऐसा लिखा हुआ था॥८॥१॥४॥
30सूही महला ५ ॥
31स्मृतियाँ, वेद, पुराण, इत्यादि सारे धार्मिक ग्रंथ पुकार पुकार कर कह रहे हैं कि
32नाम के बिना अन्य सबकुछ झूठ एवं ओच्छी बातें हैं।॥ १॥
33नाम रूपी अपार खजाना तो भक्तों के मन में बसता है।
34साधुओं की संगत करने से जन्म-मरण, मोह एवं दुख इत्यादि सब दूर हो जाते हैं।॥ १॥ रहाउ॥
35मोह, वाद-विवाद एवं अहंकार में फँसकर आदमी अवश्य ही दुखी होकर रोता है।
36परमात्मा के नाम से बिछुड़ा हुआ वह बिल्कुल भी सुख हासिल नहीं करता ॥ २ ॥
37मेरी-मेरी की भावना धारण करके जीव माया के बन्धनों में बंध जाता है और
38माया के धंधों में फंसकर नरक-स्वर्ग में जन्म लेता रहता है। ॥३ ॥
39भलीभांति विचार-विचार कर मैंने यह परिणाम निकाला है कि
40परमात्मा के नाम बिना आदमी को सुख नहीं मिलता और वह अवश्य ही अपनी जीवन-बाजी हार जाता है॥ ४॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं