गुरु ग्रंथ साहिब 75 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji
1हे मेरे वणजारे मित्र ! जीवन रूपी रात्रि के द्वितीय प्रहर में मनुष्य परमेश्वर के सिमरन को विस्मृत कर देता है। अर्थात्-जब प्राणी गर्भ से बाहर आता और जन्म लेता है तो गर्भ में की गई प्रार्थना को भूल जाता है।
2उसके परिजन, भाई-बन्धु सब उसे ऐसे नचाते हैं, हर्षित होते हैं, जैसे माता यशोदा के घर कृष्ण नचाया जाता था।
3हे मेरे वणजारे मित्र ! परिवार के समस्त लोग नश्वर प्राणी उस बच्चे को उछालते-खेलाते हैं और माता मोह-वश उसे अपना पुत्र कहकर बड़ा मान करती है।
4हे मेरे अज्ञानी एवं मूर्ख मन ! परमात्मा को स्मरण कर। अंतकाल तेरा कोई साथी नहीं होना।
5तू उसको नहीं समझता जिसने रचना रची है। अब तू अपने मन में ज्ञान प्राप्त कर ले।
6गुरु जी कहते हैं कि रात्रि के द्वितीय प्रहर में प्राणी परमेश्वर का ध्यान भुला देता है ॥२॥
7हे वणजारे मित्र ! जीवन रूपी रात्रि के तृतीय प्रहर में प्राणी का मन, धन-यौवन(स्त्री-यौवन) में रम जाता है।
8वह हरि-नाम का चिंतन नहीं करता, जिसके द्वारा वह संसार-बंधन से मुक्ति पा सकता है।
9नश्वर प्राणी प्रभु के नाम का सुमिरन नहीं करता और सांसारिक पदार्थों के साथ व्याकुल रहता है।
10वह भार्या-प्रेम की आसक्ति और यौवन की मस्ती में ऐसा लीन हो जाता है कि इस अमूल्य जीवन को व्यर्थ ही गंवा देता है।
11वह न तो धर्मानुसार आचरण करता है और न ही शुभ कर्मों के साथ मैत्री बनाता है।
12गुरु जी कहते हैं कि हे नानक ! मनुष्य का जीवन रूपी तृतीय प्रहर भी धन-यौवन की तृष्णा में नष्ट हो जाता है॥३॥
13हे वणजारे मित्र ! जीवन रूपी रात्रि के चौथे प्रहर (वृद्धावस्था) में जीवन-रूपी कृषि को काटने के लिए यमदूत उपस्थित हो जाते हैं अर्थात् देहि की कृषि तब तक पककर कटने को तैयार हो जाती है।
14हे वणजारे मित्र ! जब यमदूत उसको पकड़कर चल देते हैं तो प्राणों के अलग होने का रहस्य किसी को भी पता नहीं चलता।
15इस रहस्य बारे कि कब यमदूतों ने प्राणी को पकड़कर आगे ले जाना है, किसी को भी पता नहीं लगा।
16सो हरि का चिन्तन कर, हे मनुष्य ! झूठा है रुदन उसके आसपास। एक क्षण में ही प्राणी परदेसी हो जाता है।
17आगामी लोक में प्राणी को वही उपलब्धि होती है, जिसमें उसने चित्त एकाग्न किया होता है।
18गुरु नानक देव जी कहते हैं कि हे नानक ! जीवन रूपी चौथे प्रहर में मानव जीवन पकी कृषि लावी द्वारा काट ली जाती है। अर्थात् वृद्धावस्था में देहि का अन्त निकट आ जाता है और समय पर यमदूत प्राणी को पकड़ कर ले जाते हैं ॥४॥१॥
19श्रीरागु महला १ ॥
20हे मेरे वणजारे मित्र ! जीवन रूपी रात्रि के प्रथम प्रहर में जीव बालक बुद्धि वाला एवं ज्ञानहीन होता है।
21बालक माता का दूध पीता है और उससे बड़ा लाड-प्यार किया जाता है। हे मेरे वणजारे मित्र ! माता-पिता अपने बालक से बड़ा अनुराग करते हैं। संसार में व्याप्त मोह-माया के कारण माता-पिता स्नेह में उसके पोषण में उठाए कष्टों की भी उपेक्षा कर देते हैं।
22संयोग और पूर्व जन्मों के कर्मो की बदौलत प्राणी संसार में आता है और अब अपनी अगली जीवन मर्यादा के लिए कर्म कर रहा है।
23राम नाम के बिना मुक्ति नहीं हो सकती और द्वैत भाव में लीन रहने के कारण समूची सृष्टि का विनाश हो जाता है।
24हे नानक ! प्राणी जीवन रूपी रात्रि के प्रथम प्रहर में भगवान का नाम-सिमरन करके ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो सकता है।॥१॥
25हे वणजारे मित्र ! जीवन रूपी रात्रि के द्वितीय प्रहर में प्राणी यौवन की भरपूर मस्ती में मस्त रहता है।
26हे वणजारे मित्र ! दिन-रात वह भोग-विलास में आसक्त रहता है और उस अज्ञानी को भगवान का नाम याद ही नहीं आता।
27राम नाम उसके हृदय में नहीं बसता। वह अन्यों रसों को ही मीठा समझता है।
28जिन्हें प्रभु बारे कोई ज्ञान नहीं, जो भगवान का ध्यान नहीं करते, जो प्रभु की महिमा को स्मरण नहीं करते, जो संयम नहीं करते, ऐसे झूठे प्राणी जन्मते-मरते रहेंगे।
29हे नानक ! जो तीर्थ-स्नान नहीं करते, व्रत नहीं रखते, शुद्धिकरण, संयम एवं पाठ-पूजा नहीं करते,
30ऐसे प्राणियों का प्रेमपूर्वक भगवान की भक्ति करने से उद्धार हो जाता है। दुविधा में फँसे हुए जीवों को माया का मोह लगा रहता है।॥२॥
31हे मेरे वणजारे मित्र ! जीवन रूपी रात्रि के तृतीय प्रहर में शरीर-सरोवर पर हंस आ बैठते हैं अर्थात् प्राणी के सिर पर सफेद बाल पकने लगते हैं।
32हे वणजारे मित्र ! जीवन बीतने पर शरीर की शक्ति क्षीण हो जाती है और धीरे-धीरे शरीर पर प्रौढ़ावस्था हावी होने लगती है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं