गुरु ग्रंथ साहिब 759 · Raag Soohee · Guru Raam Daas Ji
1सतगुरु गुणों एवं नाम का सागर है और मुझे उसके दर्शनों का बड़ा चाव है।
2उसके बिना में एक घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता और उसे देखें बिना मेरी जीवन-लीला ही समाप्त हो जाती है॥ ६ ॥
3जैसे पानी के बिना मछली अन्य किसी भी उपाय से जीवित नहीं रह सकती,
4वैसे हरि के बिना संत भी जीवित नहीं रह सकता है और हरि-नाम के बिना उसके प्राण ही पखेरु हो जाते हैं। ७॥
5मेरी अपने सतिगुरु से बड़ी प्रीति है। हे मेरी माँ! मैं अपने गुरु के बिना कैसे जिंदा रह सकता हूँ।
6गुरुवाणी मेरे जीवन का आधार है और मेरा गुरुवाणी से प्रेम लगा रहता है।॥ ८॥
7हरि का नाम अमूल्य रत्न है। हे मेरी माँ! जब गुरु प्रसन्न होता है तो ही वह नाम-रत्न देता है।
8मुझे तो सत्य-नाम का ही सहारा है और मैं हरि-नाम में सुरति लगाकर रखता हूँ॥ ६॥
9गुरु का ज्ञान ही नाम रूपी पदार्थ है। वह हरि-नाम मन में बसा देता है।
10जिसके भाग्य में इसकी प्राप्ति लिखी होती है, उसे मिल जाता है और वह गुरु के चरणों में आ लगता है॥ १० ॥
11परमात्मा के प्रेम की कहानी अकथनीय है, कोई प्रियतम आकर मुझे यह कहानी सुना दे।
12मैं अपना यह मन उसे अर्पण कर दूँगा और झुक-झुक कर उसके पैरों में लग जाऊँगा ॥ ११॥
13हे परमात्मा ! एक तू ही मेरा सज्जन है, तू कर्तापुरुष बड़ा चतुर है।
14मित्र सतगुरु ने मुझे तुझ से मिला दिया है। अब मुझे सदा के लिए तेरा ही बल है॥ १२ ॥
15मेरा सतगुरु हमेशा के लिए अमर है। न वह जन्मता है और न ही वह मरता है।
16वह तो अविनाशी पुरुष है, जो सब में समा रहा है॥ १३॥
17जिस मनुष्य ने राम नाम रूपी धन संचित कर लिया है, उसकी यह नाम रूपी पूंजी पूरी रहती है।
18हे नानक ! उस मनुष्य को सत्य के दरबार में सम्मानित किया जाता है और पूर्ण गुरु की ओर से उसे शाबाश मिलती है॥ १४॥ १॥ २ ॥ ११॥
19रागु सूही असटपदीआ महला ५ घरु १
20ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
21मानव जीव विषय-विकारों में ही उलझा हुआ है और
22उसके मन को विकारों की अनेक तरंगें प्रभावित करती हैं।॥ १॥
23हे मेरे मन ! ऐसी स्थिति में उस अपहुँच, मन-वाणी से परे पूर्ण परमेश्वर को कैसे पाया जाए॥ १॥ रहाउ॥
24माया के मोह में मग्न हुआ जीव उसमें ही व्याप्त रहता है।
25अत्यंत तृष्णा लगी रहने के कारण वह कभी तृप्त नहीं होता।॥ २॥
26उसके शरीर में चाण्डाल क्रोध ही बसा रहता है
27लेकिन वह अज्ञानी यह नहीं समझता, क्योंकेि उसके मन में अज्ञानता का महा अंधेरा बना हुआ है॥ ३॥
28उसके मन को भ्रम में व्याप्त रहने के किवाड़ लगे हुए हैं,
29जिस कारण वह प्रभु के दरबार में जा नहीं पाता॥ ४॥
30आशा एवं चिन्ता ने प्राणी को बाँध कर रखा हुआ है,
31जिससे वह प्रभु को पा नहीं सकता और परायों की तरह भटकता ही रहता है।॥ ५ ॥
32ऐसे आदमी को तो परमात्मा ने सभी व्याधियों के वश में कर दिया है।
33जिस तरह जल के बिना मछली तड़पती रहती है, वैसे ही वह तृष्णाओं की प्यास में भटकता रहता है।॥ ६ ॥
34मेरी कोई चतुराई एवं उक्ति काम नहीं कर सकती।
35हे प्रभु ! मुझे एक तेरी ही आशा है॥ ७ ॥
36मैं संतों के पास विनती करता हूँ।
37नानक की यही प्रार्थना है कि मुझे अपनी संगति में मिला लो॥ ८ ॥
38परमात्मा मुझ पर कृपालु हो गया है, जिससे मैंने साधुओं की संगति पा ली है।
39हे नानक ! पूर्ण प्रभु को पा कर मैं तृप्त हो गया हूँ॥ १॥ रहाउ दूसरा ॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं