सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 758 · Raag Soohee · Guru Raam Daas Ji

1जैसे वर्षा होने से धरती सुन्दर लगती है, वैसे ही गुरु को मिलकर शिष्य प्रसन्न होता है॥ १६॥

2मैं अपने गुरु के सेवकों का सेवक बनकर उनकी सेवा करता हूँ और विनती कर-करके उन्हें बुलाता हूँ॥ १७॥

3नानक की प्रभु के पास विनती है कि मैं गुरु को मिलकर सुख प्राप्त करूँ॥ १८ ॥

4हे ईश्वर ! तू आप ही गुरु है और आप ही शिष्य है। मैं गुरु के माध्यम से तेरा ही चिंतन करता रहता हूँ॥ १९॥

5जो तेरी उपासना करते हैं, वे तेरा ही रूप बन जाते हैं। तुम अपने सेवकों की लाज बचाते आए हो ॥ २०॥

6हे हरि ! तेरी भक्ति के भण्डार भरे पड़े हैं लेकिन जो तुझे भाता हैं, तू उसे गुरु से दिलवा देता है।॥ २१॥

7जिसे तू देता है, तेरा वही सेवक इसे प्राप्त करता है और सब चतुराई निष्फल है॥ २२॥

8मैंने गुरु को स्मरण कर-करके अपना अज्ञानता की नींद में मन जगा लिया है॥ २३॥

9हे प्रभु ! नानक बेचारा तो तुझ से एक यही दान माँगता है कि मुझे अपने दासों का दास बना लो॥ २४॥

10यदि मेरा गुरु मुझे किसी बात पर डॉटता है तो वह डॉट मुझे बड़ी मीठी लगती है। यदि मुझे क्षमा कर देता है तो यह गुरु का बड़प्पन है॥ २५ ॥

11गुरुमुख जो बोलता है, वह प्रभु को स्वीकार हो जाता है लेकिन स्वेच्छाचारी इन्सान का वचन स्वीकार नहीं होता।॥ २६॥

12यदि भयंकर शीत, कोहरा एवं बर्फ ही पड़ती हो तो भी गुरु का शिष्य गुरु के दर्शन करने जाता है॥ २७ ॥

13मैं रात-दिन गुरु को देखता रहता हूँ, अपनी ऑखों में गुरु के चरण बसाकर रखता हूँ॥ २८ ॥

14मैं अपने गुरु को खुश करने के लिए अनेक उपाय करता रहता हूँ। लेकिन जो गुरु को अच्छा लगता है, उसे वही मंजूर होता है॥ २९ ॥

15हे मेरे मालिक ! मुझ पर ऐसी दया करो किं मैं दिन-रात गुरु के चरणों की आराधना करता रहूँ॥ ३०॥

16गुरु ही नानक का जीवन एवं शरीर है और गुरु को मिलकर ही वह तृप्त एवं संतुष्ट होता है॥ ३१॥

17नानक का प्रभु हर जगह मौजूद है, वह सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है॥ ३२॥ १॥

18रागु सूही महला ४ असटपदीआ घरु १०

19ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

20हे भाई ! गुरु ने प्रभु के संग सच्चा प्रेम अन्तर्मन में लगा दिया है।

21जब मैं गुरु को अपने सामने देखता हूँ तो मेरा तन-मन आनंदित हो जाता है॥ १॥

22मेरे पास प्रभु-नाम का अमूल्य धन है

23जो मैंने गुरु से पाया है। यह अमृत-नाम अगम्य एवं अथाह है॥ १॥ रहाउ॥

24मैं सतगुरु को देखकर प्रसन्न हो गया हूँ और प्रभु नाम से मेरा प्रेम लग गया है।

25प्रभु ने कृपा करके अपने साथ मिला लिया है और मैंने मोक्षद्वार पा लिया है॥ २॥

26मेरा सतगुरु ईश्वर के नाम का प्रेमी है। यदि वह मिल जाए तो मैं अपना तन-मन उसे सौंप दूँ।

27यदि पूर्व ही मेरी तक़दीर में लिखा हो तो अमृत-नाम को पी लूं॥ ३॥

28सोते वक्त गुरु की स्तुति करनी चाहिए और जागते वक्त भी गुरु गुरु जपना चाहिए।

29यदि कोई ऐसा गुरुमुख मिल जाए तो मैं उसके चरण धोऊँ ॥ ४॥

30मुझे कोई ऐसा सज्जन ढूंढ दीजिए, जो मुझे मेरे प्रियतम-प्रभु से मिला दे।

31मैंने सतिगुरु से मिलकर हरि को पा लिया है और वह मुझे सहज-स्वभाव ही मिला है॥ ५ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं