गुरु ग्रंथ साहिब 756 · Raag Soohee · Guru Amar Daas Ji
1परमात्मा सच्चा साहूकार है और उसके संत सच्चे व्यापारी हैं। झूठ के व्यापारी सत्य के द्वार पर टिक ही नहीं सकते।
2चूंकि उन्हें सत्य अच्छा नहीं लगता और वह दुखों में ही बर्बाद हो जाते हैं।॥ १८॥
3अहंकार से अपवित्र हुआ यह जगत् भटकता रहता है और बार-बार जन्मता-मरता रहता है।
4पूर्व जन्म के कर्मानुसार जो उसकी तकदीर में लिखा होता है, वह वही कर्म करता है, और उसकी तकदीर को मिटाने वाला कोई नहीं है॥ १६॥
5यदि मनुष्य संतों की संगति में मिला रहे तो उसका सत्य से प्रेम हो जाता है।
6वह सत्य का स्तुतिगान करता है, सत्य को ही अपने मन में बसा लेता है। फिर वह सत्य के द्वार पर सत्यवादी बन जाता है।॥ २०॥
7हे भाई ! पूर्ण गुरु की मति पूर्ण है और उसकी मति द्वारा रात-दिन प्रभु नाम का ध्यान करता रहता हूँ।
8अहंकार का रोग बहुत बड़ा है। लेकिन इस पर अपने मन से अंकुश लगा दिया है॥ २१॥
9मैं गुरु की स्तुति करता रहता हूँ और झुक झुक कर उसके चरणों में लगता हूँ।
10मैंनेअहंत्व को दूर करके अपना मन एवं तन गुरु को सौंपकर उसके समक्ष रख दिया है॥ २२॥
11फँसकर जीव ख्वार होता रहता है, इसलिए एक ईश्वर से ही वृत्ति लगानी चाहिए।
12हे तू अपना अहंत्व एवं ममत्व छोड़ दे तो ही तू सत्य में समाया रहेगा ॥ २३॥
13जो व्यक्ति मिले हैं, वही मेरे भाई हैं और सच्चे शब्द में ही प्रवृत्त रहते हैं।
14जो सत्य से मिल गए हैं, वे दोबारा उससे जुदा नहीं होते और सत्य के द्वार पर सत्यवादी दिखाई देते हैं।॥ २४॥
15जो सच्चे प्रभु की उपासना करते हैं, वही मेरे भाई हैं, और वही मेरे सज्जन हैं।
16वे अपने व्यर्थ अवगुणों को बेचकर, गुरु से गुणों की भागीदारी करते हैं।॥ २५॥
17गुणों की भागीदारी करने से उनके मन में बड़ा सुख उत्पन्न होता है और वे सच्ची भक्ति ही करते रहते हैं।
18वे गुरु के शब्द द्वारा सत्य-नाम का व्यापार करते हैं और नाम रूपी लाभ हासिल करते हैं।॥ २६ ॥
19मनुष्य पाप कर-करके सोना-चांदी इत्यादि धन इकट्ठा करता रहता है लेकेिन चलते समय ये उसके साथ नहीं जाता।
20नाम के सिवा कुछ भी मनुष्य के साथ नहीं जाता और यम ने तो सारी दुनिया को ठग लिया है॥ २७ ॥
21मन का सफर-खर्च केवल हरि का नाम है, इसे अपने हृदय में संभाल कर रखो !
22यह नाम रूपी सफर-खर्च अक्षय है और यह अन्तिम समय गुरुमुख का साथ निभाता है॥ २८ ॥
23हे मेरे मन ! तू जगत् के मूल प्रभु को भूला हुआ है, तू अपनी इज्जत गंवा कर यहाँ से चला जाएगा।
24यह जगत् तो माया के मोह में ही फँसा हुआ है, इसलिए गुरु की शिक्षा द्वारा सत्य का ध्यान किया कर॥ २९॥
25हरि का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता और न ही हरि-यश लिखा जा सकता है।
26जब इन्सान का मन एवं तन गुरु के शब्द में रंग जाता है तो वह हरि में लीन हुआ रहता है॥ ३०॥
27मेरा वह पति-प्रभु बड़ा ही रंगीला है और वह सहज स्वभाव ही मुझे प्रेम में रंग देता है।
28जीव रूपी कामिनी को प्रेम का रंग तभी चढ़ता है, जब वह प्रभु के चरणों में लगती है॥ ३१ ॥
29जो सतगुरु की सेवा करते हैं, वे चिरकाल से बिछुड़े हुए भी प्रभु से मिल जाते हैं।
30उनके हृदय में ही नवनिधियों वाला प्रभु का नाम बसता है, जो उनके उपयोग करने से एवं दूसरों को बांटने से समाप्त नहीं होता। वे सहज ही हरि के गुण स्मरण करते रहते हैं।॥ ३२॥
31ऐसे व्यक्ति न ही बार-बार जन्मते हैं, न ही मरते हैं और न ही दुख सहन करते हैं।
32जिनकी गुरु ने रक्षा की है, वे भवसागर में डूबने से बच गए हैं, वे हरि से मिलकर आनंद करते हैं।॥ ३३॥
33जो सज्जन प्रभु से मिले रहते हैं, वे कभी उससे बिछुड़ते नहीं।
34हे नानक ! इस जग में विरले पुरुष ही जाने जाते हैं, जो सत्य को प्राप्त कर लेते हैं।॥ ३४ ॥ १ ॥ ३ ॥
35सूही महला ३ ॥
36परमेश्वर सूक्ष्म एवं अगम्य है, फिर उसे किस विधि द्वारा मिला जाए?
37जब गुरु के शब्द द्वारा भ्रम का नाश हो जाता है तो वह नैसर्गिक ही मन में आकर बस जाता है॥ १॥
38गुरुमुख परमात्मा का नाम ही जपते रहते हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं