गुरु ग्रंथ साहिब 754 · Raag Soohee · Guru Amar Daas Ji
1वह प्यारे गुरु की रज़ा अनुसार हरि का नाम सत्य मानता है।
2उसने गुरु से ही नाम की सच्ची बड़ाई प्राप्त की है और सत्य नाम से ही प्रेम करता है।
3एक सच्चा परमात्मा ही सबमें क्रियान्वित है लेकिन कोई विरला व्यक्ति ही इसका विचार करता है।
4जब प्रभु स्वयं ही जीव को अपने साथ मिला लेता है तो वह उसे क्षमा कर देता है और अपनी भक्ति द्वारा उसका जीवन सुन्दर बना देता है॥ ७॥
5कोई गुरुमुख ही जानता है कि एक सत्य परमात्मा ही सबमें क्रियाशील है।
6दुनिया में जन्म एवं मृत्यु उसके हुक्म में ही हो रहा है। गुरुमुख ही अपने आत्मस्वरूप को पहचानता है।
7जब जीव परमात्मा के नाम का ध्यान करता है तो वह गुरु को बहुत अच्छा लगता है। वह जैसी इच्छा करता है, वही फल प्राप्त करता है।
8हे नानक ! जो अपने मन में से अहंकार समाप्त कर लेता है, उसका सब कुछ ठीक हो जाता है। ८ ॥ १॥
9सूही महला ३ ॥
10हे भाई ! काया रूपी अत्यंत सुन्दर कामिनी वही है, जिसके साथ उसका पति-प्रभु बसता है।
11वह गुरु का शब्द अन्तर्मन में बसाकर रखती है और सच्चे प्रभु के मिलाप से सदा सुहागिन बनी रहती है।
12जो व्यक्ति भगवान की भक्ति में सर्वदा लीन रहता है, वह अपने अन्तर से अहंत्व को जला देता है॥ १॥
13पूर्ण गुरु की वाणी धन्य-धन्य है।
14पूर्ण गुरु के हृदय से उत्पन्न हुई यह सत्य में ही समाई रहती है॥ १॥ रहाउ॥
15खण्ड, मण्डल एवं पाताल इत्यादि सबकुछ शरीर में ही बसता है,
16इस शरीर में ही जग को जीवन देने वाला प्रभु बसता है, जो सब जीवों की परवरिश करता है।
17जो व्यक्ति गुरुमुख बनकर परमात्मा का नाम स्मरण करता रहता है, उसकी शरीर रूपी स्त्री सदैव सुखी रहती है॥ २॥
18इस शरीर में परमात्मा स्वयं ही बसता है लेकिन अदृष्ट प्रभु देखा नहीं जा सकता।
19मूर्ख स्वेच्छाचारी इस तथ्य को नहीं बूझता और वह भगवान को ढूंढने हेतु बाहर वनों में जाता है।
20जो गुरु की सेवा करता है, वह हमेशा सुख प्राप्त करता है। गुरु ने मुझे अदृष्ट परमात्मा के दर्शन करवा दिए हैं।॥ ३॥
21इस शरीर में ही रत्न-पदार्थ विद्यमान हैं और भक्ति के भण्डार भरे हुए हैं।
22इस शरीर में ही पृथ्वी के नौ खण्ड, दुकानें, नगर एवं बाज़ार हैं।
23इस शरीर में ही परमात्मा के नाम की नवनिधियां मौजूद हैं लेकिन इनकी प्राप्ति गुरु के शब्द चिंतन द्वारा ही होती है।॥ ४॥
24तोलने वाला परमात्मा स्वयं ही शरीर में इन रत्न-पदार्थों को तोलकर तुलाता है।
25यह मन रत्न, जवाहर एवं माणिक्य है और इसका मूल्य बहुत बड़ा है।
26परमात्मा का नाम किसी भी मूल्य पर पाया नहीं जा सकता। यह तो गुरु के उपदेश द्वारा ही पाया जाता है॥ ५ ॥
27जो व्यक्ति गुरुमुख बन जाता है, वह अपने शरीर में ही नाम को खोजता है। शेष सारी दुनिया भ्रम में ही भूली हुई है।
28जिसे परमात्मा अपना नाम देता है, वही उसे प्राप्त करता है। अन्य कोई क्या चतुराई कर सकता है?
29इस शरीर में ही प्रभु का भय एवं प्रेम बसता है परन्तु यह गुरु की कृपा से ही पाए जाते हैं।॥ ६॥
30इस शरीर में त्रिदेव-ब्रह्म, विष्णु एवं शिवशंकर बसते हैं, जिन से सारे संसार की उत्पत्ति हुई है।
31जन्म-मरण रूपी प्रसार करके सच्चे प्रभु ने अपना एक खेल रचा हुआ है।
32पूर्ण सतगुरु ने स्वयं ही दिखा दिया है कि सत्य-नाम द्वारा ही मुक्ति होती है॥ ७॥
33यह शरीर जो सतगुरु की सेवा करता है, सच्चे प्रभु ने स्वयं ही उसे सुन्दर बना दिया है।
34ईश्वर के नाम बिना सत्य के द्वार पर आदमी को अन्य कोई अवलम्ब नहीं मिलता और तो ही यम उसे तंग करता है।
35हे नानक ! जिस पर प्रभु ने अपनी कृपा की है, उसे ही सत्य-नाम की बड़ाई हासिल हुई है॥ ८॥ २॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं