गुरु ग्रंथ साहिब 753 · Raag Soohee · Guru Nanak Dev Ji
1तूने ही यह संसार उत्पन्न किया है, तू स्वयं ही पैदा करके नाश कर देता है और शब्द द्वारा कई जीवों को तू सत्कृत करता है॥ ५॥
2पता नहीं लगता कि जीव अपनी देहि को मिट्टी में मिलाकर कहीं चला गया है ?
3परमात्मा स्वयं ही सब में समाया हुआ है और यह बहुत बड़ा आश्चर्य है॥ ६॥
4हे प्रभु ! तू कहीं दूर नहीं बसता, सभी जानते हैं कि एक तू ही है।
5गुरमुख तुझे अपने समक्ष ही देखते हैं और सभी के हृदय में तू ही बसता है॥ ७॥
6हे मालिक ! मुझे अपने नाम में निवास दीजिए ताकि मेरे मन में शांति प्राप्त हो।
7दास नानक का कथन है कि यदि सतगुरु सदुपदेश दे तो वह निरंकार का गुणगान करता रहे॥ ८॥ ३॥ ५॥
8रागु सूही महला ३ घरु १ असटपदीआ
9ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
10हे भाई ! परमेश्वर के नाम से ही सबकुछ उत्पन्न हुआ है, परन्तु सतगुरु के बिना नाम का ज्ञान नहीं होता।
11गुरु का शब्द मीठा महारस है लेकिन चखे बिना इसका स्वाद पता नहीं लगता।
12जिस इन्सान ने कौड़ियों के भाव अपना अमूल्य जन्म व्यर्थ ही गंवा लिया है, वह अपने आत्मस्वरूप को नहीं जानता।
13यदि वह गुरुमुख बन जाए तो वह एक परमात्मा को ही जाने और उसे अहम् रूपी दुख पीड़ित न करे॥ १॥
14मैं अपने गुरु पर बलिहारी जाता हूँ, जिसने सत्य (प्रभु) से मेरी लगन लगा दी है!
15शब्द को पहचान कर मन में प्रकाश हो गया और मैं सहज ही सत्य में विलीन रहता हूँ॥ १॥ रहाउ॥
16गुरुमुख परमात्मा के ही गुण गाता रहता है, वह परम-सत्य को ही समझाता है और शब्द का ही चिंतन करता रहता है।
17प्राण एवं शरीर सब गुरु से ही उत्पन्न होते हैं और गुरुमुख अपने कार्य संवार लेता है।
18मनमुखी अंधा आदमी अंधे कार्य ही करता है और वह संसार में माया रूपी विष ही अर्जित करता है।
19अत्यंत प्यारे गुरु के बिना वह माया के मोह में फँसकर सदा ही दुख प्राप्त करता है॥ २॥
20वही सच्चा सेवक है, जो सतगुरु की सेवा करता है और गुरु की रज़ा में चलता है।
21परमात्मा का नाम सत्य है और उसकी कीर्ति भी सत्य है, अतः यह उस सत्य को ही मन में बसाता है।
22गुरुमुख तो सच्ची वाणी ही उच्चरित करता है और उसके अन्तर्मन में से अहंत्व दूर हो जाता है।
23सतगुरु स्वयं ही दाता है और उसकी कृपा भी सत्य है। वह हमेशा सच्चा शब्द ही सुनाता है॥ ३॥
24गुरुमुख नाम की साधना करता है, नाम धन संचित करता है और दूसरों से भी परमात्मा के नाम का ही जाप करवाता है।
25वह सदा माया से निर्लिप्त रहकर सत्य के रंग में रंगा रहता है और गुरु के प्रेम द्वारा सहजावस्था में लीन रहता है।
26लेकिन मनमुखी सदैव झूठ ही बोलता है, माया रूपी वेिष बोता है और उस विष को ही खाता है।
27यह मृत्यु के बन्धन में फॅसकर तृष्णा की अग्नि में ही जलता रहता है। गुरु के बिना उसे मृत्यु से कौन छुड़ा सकता है॥ ४॥
28सतगुर ही तीर्थ है, जहाँ सत्य (नाम) रूपी सरोंवर में स्नान होता है लेकिन गुरु स्वयं ही यह सूझ देता है।
29गुरु के शब्द ने ही अड़सठ तीर्थ दिखा दिए हैं, जहाँ स्नान करने से अहंकार रूपी मैल दूर हो जाती है।
30शब्द-गुरु शाश्वत है और वह निर्मल तीर्थ है, जिसे कोई मैल नहीं लगती है और न ही माया उसे मैल लगाती है।
31सच्ची महिमा-स्तुति पूर्ण गुरु से ही प्राप्त होती है॥ ५॥
32यह तन एवं मन सबकुछ उस परमात्मा का दिया हुआ है परन्तु दुर्बुद्धि वाले व्यक्ति से यह कहा नहीं जाता।
33जब ईश्वर का हुक्म होता है तो उस की बुद्धि निर्मल हो जाती है एवं उसके मन में से अहंत्व दूर हो जाता है।
34जिस व्यक्ति ने गुरु की शिक्षा सहज ही धारण की है, उसकी तृष्णाग्नि बुझ गई है।
35वह गुरु के शब्द द्वारा प्रभु-प्रेम में मग्न हुआ सहज ही उस में समाया रहता है॥ ६॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं