सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 750 · Raag Soohee · Guru Arjan Dev Ji

1तेरे सेवक को कोई भय नहीं लगता और यम भी उसके निकट नहीं आता ॥ १॥ रहाउ ॥

2हे स्वामी ! जो तेरे रंग में रंगे हुए हैं, उनका जन्म-मरण का दुख नाश हो गया है।

3सतगुरु ने मुझे यह दिलासा दिया हुआ है कि तेरी बख्शिश को कोई मिटा नहीं सकता॥ २॥

4परमात्मा के नाम का ध्यान करने वाले फल के रूप में सुख ही हासिल करते हैं और आठों प्रहर प्रभु की आराधना करते रहते हैं।

5तेरी शरण एवं तेरे भरोसे पर वे काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार-पाँच दुष्टों को अपने वश में कर लेते हैं।॥ ३॥

6हे प्रभु ! मैं ज्ञान, ध्यान एवं धर्म-कर्म कुछ भी नहीं जानता और तेरी महत्ता को भी नहीं जानता।

7है नानक! सतिगुरु सबसे बड़ा है, जिसने मेरी इज्जत रख ली है॥ ४॥ १०॥ ५७ ॥

8सूही महला ५ ॥

9मैं सबकुछ त्याग कर गुरु की शरण में आया हूँ। हे रखवाले ! मेरी रक्षा करो।

10जिस तरफ तू हमें लगाता है, हम उधर ही लग जाते हैं। यह जीव बेचारे क्या कर सकते हैं।॥ १॥

11हे मेरे राम जी ! तू अन्तर्यामी प्रभु है।

12हे दयालु गुरुदेव ! कृपा करो ताकि मैं नित्य ही अपने स्वामी का गुणगान करता रहूँ॥ १॥ रहाउ ॥

13आठों प्रहर प्रभु का ध्यान करना चाहिए। गुरु की कृपा से भवसागर से पार हुआ जा सकता है।

14अपना अभिमान छोड़कर सबकी चरण-धूलि बन जाना चाहिए, इस प्रकार जीवित ही दुनिया के मोह से मरा जाता है॥ २ ॥

15जो व्यक्ति साधुओं की संगति में रहकर परमात्मा का नाम जपता रहता है, संसार में उसका जन्म सफल हो जाता है।

16जिस पर प्रभु स्वयं दया करता है, उसके सारे मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं।॥ ३॥

17हे मेरे स्वामी प्रभु ! तू दीनदयाल एवं कृपालु है। हे दया के घर ! मैं तेरी शरण में आया हूँ।

18नानक प्रार्थना करता है कि हे प्रभु ! कृपा करके मुझे अपना नाम एवं साधुओं की चरण-धूलि प्रदान करो ॥ ४॥ ११॥ ५८ ॥

19रागु सूही असटपदीआ महला १ घरु १

20ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

21मुझ में अवगुण ही भरे हुए हैं और कोई गुण नहीं है।

22फिर पति-परमेश्वर से कैसे मेरा मिलाप हो सकता है॥ १॥

23न मेरा रूप सुन्दर है और न ही मेरे नयन सुन्दर हैं।

24न मेरा कुलीन आचरण है और न ही मेरे मीठे बोल हैं।॥ १॥ रहाउ॥

25जो जीव-स्त्री सहजावरथा का श्रृंगार करके अपने पति-परमेश्वर के पास आती है,

26तो वही सुहागेिन परमेश्वर को भाती है॥ २॥

27उस प्रभु का न कोई रूप है और न कोई चिन्ह है।

28वह मालिक अंतकाल याद नहीं किया जा सकता ॥ ३॥

29मुझ में सुरति, बुद्धि एवं चतुराई नहीं है।

30हे प्रभु ! कृपा करके अपने चरणों में लगा लो॥ ४ ॥

31जो जीव-स्त्री बहुत ज्यादा चतुर बनती है, वह पति-परमेश्वर को अच्छी नहीं लगती।

32माया में फँसी हुई जीव-स्त्री भ्रम में ही भूली रहती है। ५॥

33यदि जीव-स्त्री अपना अहंत्व दूर कर दे तो वह पति-परमेश्वर में विलीन हो सकती है और

34तब ही उसे नवनिधियों का स्वामी प्यारा-प्रभु प्राप्त होता है॥ ६॥

35हे प्रियतम प्रभु ! अनेक जन्म तुझसे बिझुड़कर मैंने दुख ही पाया है,

36अतः मेरा हाथ पकड़कर मुझे अपना बना लो॥ ७ ॥

37नानक कथन करते हैं कि प्रभु वर्तमान में भी स्थित है और भविष्य में भी होगा।

38जो जीव-स्त्री उसे अच्छी लगती है, वह प्यारा-प्रभु उससे ही प्रेम करता है। ८॥ १॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं