गुरु ग्रंथ साहिब 74 · Siree Raag · Guru Arjan Dev Ji
1गुरु के शिष्यों से बातें सुनकर मैं गुरु के पास आया हूँ।
2गुरु ने मुझे नाम, दान-पुण्य और स्नान निश्चित करवा दिया है।
3हे नानक ! नाम रूपी सच्ची नाव पर सवार होने के कारण सारा संसार बच गया है। ११॥
4हे प्रभु ! सारी सृष्टि दिन-रात तेरी सेवा का फल पाती है।
5हे स्वामी ! अपना कान देकर मेरी प्रार्थना सुनो।
6मैंने सभी को भलीभांति निर्णय करके देख लिया है। केवल तुम ही अपनी प्रसन्नता द्वारा प्राणियों को मोक्ष प्रदान करते हो ॥१२॥
7अब मेहरबान परमात्मा का आदेश जारी हो गया है।
8कोई भी किसी को दुखी नहीं करता।
9सारी दुनिया सुखपूर्वक रहती है। क्योंकि अब यहाँ सात्विक का राज्य स्थापित हो गया है॥१३॥
10सतिगुरु मेघ की भाँति अमृत बरसा रहे हैं।
11मैं उस तरह बोलता हूँ, जिस तरह भगवान मुझे बुलाता है।
12हे दाता ! मुझे तुम पर बड़ा गर्व है। | तुम स्वयं ही मेरे कर्मों को निर्दिष्ट कर सफल बनाते हो॥१४॥
13हे प्रभु ! तुम्हारे भक्तों को सदा तुम्हारे दर्शनों की लालसा है।
14हे प्रभु ! मेरी मनोवांछित कामनाओं को सफल करो।
15हे सुखदाता ! मुझे अपने दर्शन देकर अपने गले से लगा लो॥१५॥
16तेरे जैसा महान् मुझे अन्य कोई नहीं मिला।
17तुम धरती, आकाश व पाताल में व्यापक हो।
18सातों द्वीपों और पाताल लोकों में तुम्हारा ही आलोक प्रसारित है। हे नानक ! भक्तों को परमात्मा का ही सहारा है॥१६॥
19मैं अपने मालिक प्रभु का एक छोटा-सा पहलवान हूँ।
20गुरु से मिलकर मैंने ऊँची दस्तार सजा ली है।
21मेरी कुश्ती देखने के लिए तमाशा देखने वालों की भीड़ एकत्र हो गई है और दयालु परमात्मा स्वयं बैठ कर देख रहा है॥१७॥
22अखाड़े में वाजे, नगाड़े और तूतीयाँ बज रहे हैं।
23पहलवान अखाड़े के अन्दर प्रवेश करते हैं और इसके आसपास चक्कर काट रहे हैं।
24मैंने अकेले ही पाँच जवानों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) को पराजित कर दिया है और गुरु ने मेरी पीठ पर शाबाश (आशीर्वाद) दी है॥१८॥
25समस्त जीव जन्म लेकर दुनिया में इकट्टे हुए हैं।
26ये विभिन्न योनियों में पड़कर अपने घर परलोक में चले जाएँगे।
27गुरमुख नाम रूपी पूंजी का लाभ प्राप्त करके जाएँगे, जबकि मनमुख अपना मूल भी गंवा देंगे ॥१९॥
28हे प्रभु ! तेरा कोई वर्ण अथवा चिन्ह नहीं।
29परमात्मा प्रत्यक्ष ही सबको दर्शन देता है।
30हे गुणों के भण्डार ! हे पारब्रह्म-परमेश्वर ! तुम्हारे भक्त तुम्हारा यशोगान निरन्तर सुनते, तेरा सुमिरन करते और तेरे ही रंग में मग्न हैं॥२०॥
31मैं समस्त युगों में भगवान की भक्ति करता रहा हूँ।
32गुरु ने माया-बन्धन की बेड़ियों काट फेंकी है।
33मैं संसार के अखाड़े में पुनः पुनः दंगल करने नहीं जाऊँगा, क्योंकि हे नानक ! मैंने मनुष्य-जीवन का सही मूल्य जानकर उसे सार्थक कर लिया है ॥२१॥२॥२९॥
34ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
35श्रीरागु महला १ पहरे घरु १ ॥
36हे मेरे वणजारे (व्यापारी) मित्र ! जीवन रूपी रात्रि के प्रथम प्रहर में ईश्वर के आदेशानुसार प्राणी माता के गर्भ में आता है।
37हे मेरे वणजारे मित्र ! वह गर्भ में उलटा लटका हुआ तपस्या करता है और भगवान के समक्ष प्रार्थना करता रहता है।
38वह उलटा लटका हुआ भगवान के ध्यान में सुरति लगाता है।
39वह रस्मों की मर्यादा के बिना दुनिया में नग्न आता है और मरणोपरांत नग्न ही जाता है।
40विधाता ने प्राणी के कर्मानुसार उसके मस्तक पर जो भाग्य रेखाएँ खींच दी हैं, उसी के अनुसार उसे सुख-दुख उपलब्ध होते हैं।
41गुरु नानक देव जी कहते हैं कि रात्रि के प्रथम-प्रहर में ईश्वर की इच्छानुसार प्राणी गर्भ में प्रवेश करता है।॥१॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं