गुरु ग्रंथ साहिब 749 · Raag Soohee · Guru Arjan Dev Ji
1हे हरि ! तेरे संत खुशनसीब हैं, जिनके हृदय-घर में नाम रूपी धन है।
2उनका जन्म लेकर जगत् में आना ही स्वीकार गिना जाता है और उनके सब कार्य सफल हो जाते हैं।॥ १॥
3हे मेरे राम ! मैं संतजनों पर बलिहारी जाता हूँ और
4अपने केशों का चंवर बनाकर उनके सिर पर झुलाता हूँ, और उनके चरणों की धूल मुख पर लगाता हूँ। ॥ १॥ रहाउ॥
5वे जीवों पर परोपकार करने के लिए जगत् में आए हैं और वे जन्म-मरण दोनों से ही रहित हैं।
6वे जीवों को नाम-दान देकर उन्हें भक्ति में लगाते हैं और उनका भगवान से मिलाप करवा देते हैं।॥ २॥
7जिस परमात्मा का हुक्म शाश्वत है और जिसकी बादशाहत भी शाश्वत है, वे उस सत्य में ही रंगे रहते हैं।
8उन्हें सच्चा सुख एवं सच्ची बड़ाई मिलती है। जिस परमात्मा के वे सेवक होते हैं, वे उसे ही जानते हैं॥ ३॥
9हे हरि ! मैं तेरे संतजनों के घर चक्की पीस कर उनकी सेवा करूँ, उन्हें पंखा झुलाऊँ और उनके लिए पानी ढोऊँ।
10नानक की प्रभु के समक्ष यही विनती है केि मैं तेरे संतजनों का दर्शन करता रहूँ॥ ४॥ ७ ॥ ५४॥
11सूही महला ५ ॥
12हे परब्रह्म-परमेश्वर, हे सतगुरु, तू स्वयं ही सब कुछ कर सकने वाला है,
13तेरा सेवक तेरी चरण-धूलि मॉगता है और तेरे दर्शन पर बलिहारी जाता है॥ १॥
14हे मेरे राम ! जैसे तू मुझे रखता है, वैसे ही मैं रहता हूँ।
15जब तुझे उपयुक्त लगता है तो तू अपना नाम जपवाता है। मैं तेरा दिया हुआ ही सुख लेता हूँ॥ १॥ रहाउ॥
16माया के बन्धनों से मुक्ति, भुक्ति एवं जीवन-युक्ति तेरी सेवा करने से ही मिलती है, जिसे तू स्वयं ही अपने सेवकों से करवाता है।
17जहाँ तेरा कीर्तन किया जाता है, वहाँ ही बैकुण्ठ बन जाता है। तू स्वयं ही अपने सेवकों के मन में श्रद्धा उत्पन्न करता है॥ २॥
18हरदम तेरा नाम-सिमरन करने से ही मुझे जीवन मिलता रहता है और मेरा मन-तन निहाल हो जाता है।
19हे मेरे दीनदयालु सतगुरु ! मैं तेरे सुन्दर चरण कमल धो-धोकर पीता रहूँ॥ ३॥
20मैं उस सुन्दर वक्त पर कुर्बान जाता हूँ, जब मैं तुम्हारे द्वार पर आया था।
21हे भाई ! जब प्रभु नानक पर कृपालु हुआ तो उसने पूर्ण सतगुरु को पा लिया ॥ ४॥ ८ ॥ ५५ ॥
22सूही महला ५ ॥
23हे प्रभु ! जब तू याद आता है तो मन में बड़ा आनंद पैदा होता है। लेकिन जिसे तू भूल जाता है, उसकी तो मृत्यु ही हो जाती है,
24हे कर्ता ! जिस पर तू दयालु हो जाता है, वह सदैव तेरा ध्यान करता रहता है। १॥
25हे मेरे मालिक ! तू मुझ जैसे मानहीन का सम्मान है।
26मैं अपने प्रभु के समक्ष प्रार्थना करता हूँ कि तेरी वाणी सुन-सुनकर ही जीता रहूँ॥ १॥ रहाउ॥
27मैं तेरे सेवक की चरण-धूलि बन जाऊँ और तेरे दर्शन पर बलिहारी जाता रहूँ।
28मैं तेरे अमृत वचन हृदय में धारण करता हूँ और तेरी कृपा से ही संतों की संगति मिली है॥ २॥
29मैंने अपने मन की हालत तेरे समक्ष रख दी है और तेरे जैसा महान् अन्य कोई नहीं है।
30जिसे तू अपनी भक्ति में लगाता है, वही भक्ति में लगता है और वही तुम्हारा भक्त है॥ ३॥
31मैं अपने दोनों हाथ जोड़कर तुझसे एक दान माँगता हूँ। हे मालिक ! यदि तू प्रसन्न हो जाए तो मैं यह दान हासिल कर लूं।
32नानक सांस-सांस से तेरी आराधना करता रहे और आठ प्रहर तेरा गुणगान करता रहे॥ ४॥ ६॥ ५६॥
33सूही महला ५ ॥
34हे स्वामी ! जिसके सिर पर तूने अपना हाथ रखा है, वह दुख कैसे पा सकता है ?
35माया के नशे में मस्त हुआ व्यक्ति प्रभु का नाम बोलना ही नहीं जानता और उसे मरना भी याद नहीं आता॥ १॥
36हे मेरे राम ! तू संतों का स्वामी है और संत तेरे सेवक हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं