सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 743 · Raag Soohee · Guru Arjan Dev Ji

1हे नानक ! मैंने श्री हरि के चरण पकड़ लिए हैं और उसकी शरण में आ गया हूँ॥ ४॥ २२॥ २८ ॥

2सूही महला ५ ॥

3जो धर्म को छोड़कर दुनियादारी में लग जाता है

4वह लोक परलोक दोनों में गुनहगार कहलाता है॥ १॥

5जो ईश्वर को उपयुक्त लगता है, मुझे वह खुशी-खुशी मंजूर है।

6अपनी कुदरत को वह स्वयं ही जानता है॥ १॥ रहाउ॥

7वह जिस आदमी से सच्चा धर्म, पुण्य एवं भलाई का कार्य करवाता है,

8उसे इकट्टे किए धर्म के भण्डार के कारण उसकी दुनिया नहीं बिगड़ती॥ २॥

9सब जीवों के हृदय में एक परमात्मा ही जाग्रत रहता है।

10उसने जीवों को जिस कार्य में भी लगाया है, वे वहाँ ही लग गए हैं।॥ ३॥

11मेरा मालिक अगम्य, अगोचर एवं शाश्वत है।

12हे प्रभु ! नानक तेरा बुलाया हुआ ही बोलता है॥ ४॥ २३॥ २६॥

13सूही महला ५ ॥

14मैं प्रात:काल प्रभु का नाम उच्चारित करता रहता हूँ,

15जिससे लोक-परलोक की ओट संवार ली है॥ १॥

16हे जिज्ञासु ! सदा परमात्मा का नाम जपते रहना चाहिए,

17इससे सारी मनोकामनाएँ पूरी हो जाती हैं। १॥ रहाउ॥

18उस अविनाशी प्रभु का दिन-रात गुणगान करो।

19जीवित ही मोह-अभिमान को मार कर निश्चल स्थान पा लो॥ २॥

20उस साहूकार प्रभु की भक्ति करो, जिससे किसी प्रकार की कमी नहीं आती ।

21नाम-धन का उपयोग करने एवं दूसरों से इस्तेमाल करवाने से जिंदगी सुख एवं आनंद में व्यतीत होती है॥ ३॥

22परमपुरुष परमेश्वर जग का जीवन है और उसे साधसंगति द्वारा ही पाया जा सकता है।

23हे नानक ! गुरु के आशीर्वाद से मैंने परमात्मा के नाम का ही ध्यान किया है॥ ४॥ २४ ॥ ३० ॥

24सूही महला ५ ॥

25जब पूर्ण गुरु दयालु हो गया तो

26मेरे सब दुख नाश हो गए और नाम-सिमरन की साधना साकार हो गई॥ १॥

27हे मालिक ! तुम्हारा दर्शन देख-देखकर ही जीता हूँ और

28मैं तेरे चरण-कमल पर बलिहारी जाता हूँ।

29हे ठाकुर जी ! तेरे बिना हमारा कौन है ?॥ १॥ रहाउ॥

30साधु-संगति से मेरी प्रीति बन गई है और

31पूर्व जन्म के कर्मानुसार साधसंगति पाई है॥ २॥

32परमात्मा का नाम जपने से अद्भुत प्रताप हो गया है।

33अब आधि, व्याधि एवं उपाधी-तीनों ही ताप जला नहीं सकते॥ ३॥

34तुम्हारे सुन्दर चरण एक क्षण भर के लिए भी न भूले,

35हे हरि ! नानक तुझसे यही दान चाहता है ॥ ४। २५ ॥ ३१ ॥

36सूही महला ५ ॥

37हे मेरे प्यारे ! ऐसा संयोग बनाओ,

38जिससे मेरी जीभ तेरा नाम उच्चारित करती रहे ॥ १॥

39हे दीनदयाल प्रभु ! मेरी एक विनती सुनो;

40साधु हमेशा ही तेरा रसीला गुणगान करते रहते हैं।॥ १॥ रहाउ॥

41हे प्रभु ! तेरा सिमरन जीवन रूप है।

42जिस पर तू अपनी कृपा करता है, उसके निकट आ बसता है॥ २ ॥

43तेरा नाम ऐसा भोजन है, जिससे भक्त की सारी भूख दूर हो जाती है।

44हे प्रभु ! तू दाता है और सब कुछ देने वाला है॥ ३॥

45प्रेमपूर्वक राम नाम जपकर संतजनों ने सुख ही माना है।

46हे नानक ! वह देने वाला परमात्मा बड़ा चतुर है॥ ४॥ २६॥ ३२॥

47सूही महला ५ ॥

48हे जीव ! तेरी जीवन रूपी नदिया बहती जा रही है, पर तू कभी इस तरफ दृष्टि भी नहीं करता।

49तू नित्य ही मिथ्या मोह के झगड़े में फंसा रहता है॥ १॥

50इसलिए नित्य ही माधव का भजन करते रहो और

51हरि की शरण में पड़कर अपनाअमूल्य जन्म जीत लो ॥ १॥ रहाउ ॥

52तू अपने दोनों हाथों के जोर से पाप करता है, किन्तु रत्न जैसे अमूल्य राम नाम को अपने हृदय में तिल मात्र भी धारण नहीं करता ॥ २ ॥

53तूने भरण-पोषण में सारी जिंदगी व्यतीत कर ली है,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं