सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 742 · Raag Soohee

1सूही महला ५ ॥

2हे मेरे गुरु ! मैं तेरा दर्शन देखकर ही जीता हूँ।

3इस तरह प्रभु की मुझ पर पूर्ण कृपा हुई है॥ १॥

4हे मेरे प्रभु ! मेरी यह विनती सुनो,

5मुझे नाम देकर अपना चेला बना लो॥ १॥ रहाउ ॥

6हे दाता प्रभु! मुझे हमेशा अपनी शरण में ही रखो।

7गुरु की कृपा से किसी विरले ने ही तुझे जाना है॥ २॥

8हे मेरे मित्र प्रभु ! मेरी विनय सुनो,

9तेरे सुन्दर चरण मेरे चित्त में बस जाएँ॥ ३॥

10नानक एक यही अरदास करता है कि

11हे पूर्ण गुणों के भण्डार ! तू मुझे कदापि न भूले ॥ ४॥ १८ ॥ २४ ॥

12सूही महला ५ ॥

13ईश्वर ही मेरा दोस्त, साजन, पुत्र, संबंधी एवं भाई है।

14मैं जहाँ कहीं भी देखता हूँ, प्रभु ही मेरे साथ है और वही मेरा मददगार है॥ १॥

15प्रभु का नाम ही मेरी जाति, मेरी इज्जत एवं मेरा धन है।

16जिससे मुझे परम सुख, आनंद एवं आराम मिलता है॥ १॥ रहाउ ॥

17परब्रह्म को जपकर नाम रूपी रक्षा कवच पहन लो,

18क्योंकि इसे धारण करने से करोड़ों शस्त्र भी बेध नहीं सकते ॥२॥

19परमात्मा के चरणों की शरण ही हमारा दुर्ग है और

20दुखदायी यम का खौफ भी इसे ध्वस्त नहीं कर सकता॥ ३॥

21दास नानक सदैव ही उन पर पर कुर्बान जाता है,

22हे राजा राम ! जो तेरे सेवक एवं संत है !! ४॥ १६ ॥ २५ ॥

23सूही महला ५ ॥

24मैं नित्य ही प्रभु के गुण गाती रहती हूँ,

25जिससे मुझे बड़ा आनंद, विनोद, मंगल एवं सुख उपलब्ध होते हैं।॥ १॥

26हे सखी ! चलो, अपने प्रभु का स्मरण करके आनंद प्राप्त करने जाएँ और

27साधुजनों के चरणों में पड़ें ॥ १॥ रहाउ॥

28मैं विनती करके संतजनों की चरण-धूलि की ही कामना करती हूँ।

29इस प्रकार अपने जन्म-जन्मांतर के पाप दूर करती हूँ॥ २ ॥

30मैं उनको अपना मन, तन, प्राण एवं आत्मा अर्पण करती हूँ।

31हरि का सिमरन करके अपना अभिमान एवं मोह को नाश करती रहती हूँ॥ ३॥

32हे दीनदयाल ! मेरे मन में उत्साह पैदा करो ताकि

33दास नानक तेरी शरण में समाया रहे॥ ४ ॥ २० ॥ २६ ॥

34सूही महला ५ ॥

35असल में वह बैकुंठ नगर ही है, जहाँ पर संतों का निवास है।

36प्रभु के चरण-कमलों का उनके हृदय में ही निवास होता है॥ १॥

37हे मेरे मन एवं तन ! जरा सुनो, मैं तुझे सुख दिखलाऊँ।

38मैं तुझे अनेक प्रकार के व्यंजन एवं भोग कराऊँ॥ १॥ रहाउ ॥

39अपने मन में अमृत नाम चखो।

40इस नाम के अद्भुत स्वाद वर्णन नहीं किए जा सकते॥ २॥

41नाम चखने से मन में से लोभ मर गया है और तृष्णा भी बुझकर खत्म हो गई है।

42संतजनों ने तो परब्रह की शरण ही देखी है ॥३॥

43मेरे जन्म-जन्मांतर के भय एवं मोह दूर कर दिए हैं

44नानक पर प्रभु ने कृपा की है ।॥ ४॥ २१॥ २७ ॥

45सूही महला ५ ॥

46प्रभु ने दास की अनेक त्रुटियाँ निवृत्त कर दी हैं और

47कृपा करके उसे अपना बना लिया है॥ १॥

48हे प्रभु जी ! तूने अपने सेवक को छुड़ा लिया है,

49क्योंकि वह स्वप्न जैसे जगत् रूपी जाल में उलझ पड़ा था ॥ १॥ रहाउ॥

50मुझ में पर्वत जैसे महा विकराल दोष थे,

51जिन्हें दयालु प्रभु ने क्षण में ही दूर कर दिया है॥ २॥

52शोक, रोग एवं अत्यंत भारी विपति

53परमात्मा का नाम जपने से दूर हो गई है॥ ३॥

54प्रभु ने कृपा-दृष्टि करके मुझे अपने दामन के साथ लगा लिया है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं