गुरु ग्रंथ साहिब 73 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji
1हे भगवान ! तुमने स्वयं ही सृष्टि की रचना की है
2और जगत् रूपी खेल को साज कर प्रत्यक्ष किया है।
3समस्त स्थानों पर सत्य प्रभु के सत्य हुक्म का प्रसार हो रहा है, किन्तु उसके मूल रहस्य को वही समझता है जिसे तुम समझाते हो ॥२०॥
4गुरु की कृपा से जिसने भगवान को पा लिया है,
5भगवान ने उसका माया का मोह नष्ट कर दिया है।
6अपनी कृपा करके वह स्वयं अपने साथ मिला लेता है ॥ २१॥
7हे प्रभु ! तुम ही गोपी हो, तुम ही यमुना हो,
8तुम ही कृष्ण हो। तूने ही कृष्ण रूप में गोवर्धन पर्वत अपनी उंगली पर उठाया था।
9तूने ही अपने हृदय में जीवों के शरीर रूपी बर्तन निर्मित किए हैं। तुम स्वयं ही इन शरीर रूपी बर्तनों को नष्ट करते एवं निर्माण करते हो ॥२२॥
10जिन्होंने अपना चित सतिगुरु से लगाया है,
11उन्होंने माया का मोह दूर कर दिया है।
12ऐसे प्राणियों की ज्योति निर्मल हो जाती है। वह अपने जीवन को संवार कर परलोक में जाते हैं। ॥२३॥
13हे भगवान ! तुम हमेशा ही मुझ पर उपकार करते रहते हो। मुझ पर कृपा करो चूंकि मैं दिन-रात तेरी महिमा करता रहूँ।
14तू इतना दयालु है कि बिना मांगे ही जीवों को दान देता रहता है। हे नानक ! हमेशा ही भगवान का सिमरन करते रहूँ ॥२४॥१॥
15श्रीरागु महला ५ ॥
16मैं सतिगुरु के चरणों में पड़कर मन्नत करता हैं,
17क्योंकि महापुरुष सतिगुरु ने मुझे उस ईश्वर से मिला दिया है। उस जैसा महान् जगत् में अन्य कोई भी नहीं ॥१॥ रहाउ॥
18मेरा मालिक प्रभु मुझे बहुत प्रिय है।
19वह माता और पिता से बहुत मीठा लगता है।
20हे प्रभु ! बहन-भाई, मित्रादि स्वजनों में तुम्हारे जैसा अन्य कोई नहीं॥१ll
21तुम्हारे आदेश से श्रावण का महीना आया है।
22तुम्हारी प्रसन्नता हेतु मैंने सत्य का हल जोड़ा है।
23इस आशा में कि ईश्वर, अपनी कृपा से दातों का अम्बार उत्पन्न करेगा, मैं नाम बीज बोने लगा हूँ॥२॥
24हे ईश्वर ! गुरु से मिलन के कारण मैं केवल तुम्हें ही पहचानता हूँ।
25मैं अपने मन के अन्दर किसी अन्य हिसाब को नहीं जानता हूँ।
26ईश्वर ने एक कार्य मेरी जिम्मेदारी में लगाया है, जिस तरह उसको अच्छा लगता है, उसी तरह मैं उसको सम्पन्न करता हूँ॥३॥
27हे मेरे भाईयो ! आप नाम पदार्थ सेवन करो एवं आनंद मानो।
28परमेश्वर के दरबार में गुरदेव ने मुझे भक्ति रूपी पोशाक भेंटकर प्रतिष्ठा प्रदान की है।
29मैं शरीर रूपी गांव का स्वामी हो गया हूँ और काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार इत्यादि अपने पांचों शरीकों को मैंने बांध लिया है॥४॥
30हे प्रभु ! जब से मैंने तेरी शरण ली है।
31तब से मेरी पांचों ज्ञानेन्द्रियाँ मेरे सेवकों की भाँति मेरी आज्ञा में रहती हैं।
32मेरे खिलाफ अब कोई कान (सिर) उठाने का साहस नहीं कर सकता। हे नानक ! इसलिए शरीर रूपी गांव आध्यात्मिक सम्पदा की सघन्ता से बस गया है॥५॥
33हे मेरे प्रभु! मैं तुझ पर बलिहार हूँ, कुर्बान हूँ,
34श्वास-श्वास मैं तुम्हारा ही नाम जपता हूँ।
35मेरा मन ऊजड़-गांव (गुण-रहित) की भाँति था, तुमने उसे बसा दिया है, इसलिए मैं तुझ पर बलिहार जाता हूँ॥६॥
36हे मेरे प्रियतम प्रभु ! तेरा मैं सदैव ही सिमरन करता हूँ
37और जैसी मेरी अभिलाषा थी मेरी वह कामना पूरी हो गई है।
38तुमने मेरे समस्त कार्य संवार दिए हैं और मेरी आत्मा की भूख निवृत्त कर दी है॥७॥
39मैंने संसार के मिथ्या कार्य त्याग दिए हैं।
40मैं सृष्टि के स्वामी की आराधना करता हूँ।
41नवनिधि को देने में समर्थ कल्पवृक्ष-समान हरिनाम मुझे मिला है, जिसे बड़े यत्न से मैंने अन्तर्मन में संजोया हुआ है।॥८॥
42मैं बहुत सुखी हूँ चूंकि मैंने सुख प्राप्त कर लिया है।
43गुरु ने मेरे हृदय में भगवान का नाम बसा दिया है।
44सतिगुरु ने मेरे माथे पर हाथ रखकर अर्थात् आशीर्वाद देकर मुझे भगवान के साक्षात् दर्शन करवा दिए हैं॥९ ॥
45मैंने सच्चाई के मन्दिर की धर्मशाला बनाई है।
46गुरु के शिष्यों को ढूंढ कर मैं यहाँ पर लेकर आया हूँ।
47मैं उनके चरण धोता हूँ, पंखा झुलाता और विनम्रतापूर्वक झुक-झुककर उनके चरण स्पर्श करता हूं॥१०॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं