गुरु ग्रंथ साहिब 736 · Raag Soohee · Guru Raam Daas Ji
1कोई विरला पुरुष ही इससे छूटता है और मैं उस पर बलिहारी जाता हूँ॥ ३॥
2जिसने यह सृष्टि-रचना की है, वह हरि स्वयं ही इस तथ्य को जानता है और उस का रूप अपार है।
3हे नानक ! ईश्वर अपनी सृष्टि को देखकरस्वयं प्रसन्न होता है, यह ब्रह्म ज्ञान गुरु द्वारा ही प्राप्त होता है॥ ४ ॥ ३ ॥ १४ ॥
4सूही महला ४ ॥
5जो यह सारा विश्व पैदा किया हुआ है, यह सब ईश्वर ने अपनी इच्छा से पैदा किया है। उसकी इच्छा से ही सबकुछ हो रहा है। हम तो ही कुछ कर सकते हैं यदि कुछ करने की समर्था हो।
6हमारा अपना किया कुछ भी नहीं होता। जैसे ईश्वर को उपयुक्त लगता है, वैसे ही हमें वह रखता है॥ १॥
7हे मेरे श्री हरि ! सबकुछ तेरे ही वश में है।
8हम में कोई जोर ही नहीं है कि हम कुछ कर सकें। जैसे तुझे ठीक लगता है, वैसे ही हम पर कृपा करो।॥ १॥ रहाउ ॥
9प्राण एवं शरीर यह सबकुछ तूने स्वयं ही दिया है और तूने ही जगत् के कार्य में लगाया है।
10हे मालिक ! जैसा तू हुक्म करता है, वैसा ही कोई जीव कर्म करता है। जैसा तूने किसी की तकदीर में लिख दिया है, वह वैसा ही पाता है ॥ २॥
11हे परमपिता ! आकाश, पवन, अग्नि, जल एवं पृथ्वी-यह पाँच तत्व उत्पन्न करके तूने सृष्टि का निर्माण किया है। कोई छठा तत्व उत्पन्न करके बताए, यदि उसका किया कुछ हो सकता है।
12हे स्वामी ! तू किसी को गुरु से मिलाकर सूझ प्रदान कर देता है और किसी को तू मनमुख बना देता है, जो दुखी होकर रोता रहता है॥ ३॥
13मैं भगवान् की महिमा कथन नहीं कर सकता, क्योंकि मैं तो मूर्ख, मुग्ध एवं नाचीज हूँ।
14हे मेरे स्वामी ! अपने सेवक नानक को क्षमा कर दो, मैं अनजान तेरी शरण में आ गया हूँ॥ ४॥ ४॥ १५ ॥ २४॥
15रागु सूही महला ५ घरु १
16ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
17जैसे बाजीगर ने बाजी डाली और
18उसने तमाशा देखने वालों को अपने विभिन्न रूप एवं वेष दिखाए।
19जब उसने स्वांग उतार कर अपनी खेल का विस्तार बंद कर दिया तो
20वह केवल एक आप ही रह गया।वैसे ही परमात्मा सृष्टि का खेल दिखाकर जब बंद कर देता है तो वह एक स्वयं ही रह जाता है।॥ १॥
21उसके जो रूप दिखाई देते थे, वे सब लुप्त हो गए।
22वह कहाँ चला गया है और कहाँ से आया था ॥ १॥ रहाउ॥
23जल में से अनेक तरंगें उत्पन्न होती हैं।
24सुनार ने अनेक प्रकार के स्वर्ण के आभूषण बनाए होते हैं।
25पेड़ का एक बीज बो कर देखा है कि वही बीज जड़ों, शाखाओं एवं पते इत्यादि अनेक प्रकार का बन जाता है परन्तु
26फल पकने पर वह पुनः बोया हुआ बीज ही बन जाता है। इस तरह ही सृष्टि का मूल एक ईश्वर ही है॥ २॥
27जल से भरे हुए हजारों घड़ों में एक ही सूर्य का अक्स दिखाई देता है।
28लेकिन घड़े फूटने पर सूर्य का वही एक प्रकाश नजर आता है।
29भृमवश जीवात्मा में लोभ, मोह रूपी माया के विकार पैदा हो जाते हैं लेकिन
30भृम का नाश होने से उसे एक परमात्मा ही नजर आता है॥ ३॥
31ईश्वर अविनाशी है और वह कभी नाश नहीं होता।
32न ही वह जन्म लेता है और न ही उसकी मृत्यु होती है।
33पूर्ण गुरु ने मेरी अहंत्व रूपी मैल शुद्ध कर दी है,
34हे नानक ! मेरी परमगति हो गई है॥ ४॥ १॥
35सूही महला ५ ॥
36हे प्रभु ! दुनिया में वही कुछ होता है, जो तू चाहता है।
37तेरे बिना दूसरा कोई समर्थ नहीं।
38जो व्यक्ति तेरी उपासना करता है, उसके सब कार्य संवर जाते हैं।
39अतः अपने दास की भी लाज रखो॥ १॥
40हे पूर्ण दयालु ! मैं तेरी शरण में आया हूँ,
41तेरे बिना मेरी कौन देखभाल करेगा ॥ १॥ रहाउ॥
42तू जल, धरती एवं गगन में हर जगह मौजूद है।
43हे प्रभु ! तू कहीं दूर नहीं, तू तो सबके निकट ही रहता है।
44लोगों को खुश करने से कुछ भी हासिल नहीं होता।
45यदि इन्सान सत्य के साथ लग जाए तो उसका अहंत्व समाप्त हो जाता है। २॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं