गुरु ग्रंथ साहिब 734 · Raag Soohee · Guru Raam Daas Ji
1लेकिन गुरु की कृपा से ही प्रभु मन में आ बसता है तथा किसी अन्य विधि से उसे पाया नहीं जा सकता ॥१॥
2हे भाई ! हरि-नाम रूपी धन संचित करना चाहिए,
3चूंकिं लोक-परलोक में वह सहायक बना रहे॥ १॥ रहाउ ॥
4हरि नाम रूपी धन सत्संगेियों के साथ मिलकर ही प्राप्त किया जाता है। किसी अन्य स्थान पर एवं किसी अन्य उपाय से हरि-धन कहीं भी पाया नहीं जा सकता।
5हरि-नाम रूपी रत्नों का व्यापारी हरि-धन रूपी रत्नों को ही खरीदता है। परन्तु माया धन के व्यापारियों से केवल बातों से हरि-धन खरीदा नहीं जा सकता॥ २॥
6हरि धन अमूल्य रत्न, जवाहर एवं माणिक्य है। हरि के भक्तों ने हरि-धन से ब्रह्ममुहूर्त में जागकर हरि में अपनी सुरति लगाई होती है।
7महामुहूर्त में बोया हुआ हरि धन भक्त खाते रहते हैं और दूसरों को खिलाते रहते हैं। परन्तु यह कभी खत्म नहीं होता।
8लोक-परलोक में भक्तों को हरि धन की बड़ाई मिली है। ३ ।
9हरिं नाम रूपी धन निर्भय एवं सदा सर्वदा स्थिर है। यह सदैव शाश्वत है और यह अग्नि, चोर, पानी एवं यमदूत इत्यादि से प्रभावित नहीं होता।
10हरि धन को लूटने के लिए कोई भी लुटेरा निकट नहीं आता तथा यमराज रूपी महसूली इसे कर नहीं लगाता॥ ४॥
11मायावी जीवों ने पाप कर करके जो विष रूपी धन इकठ्ठा किया है, ये धन एक कदम भी उनके साथ नहीं जाता।
12मायावी इहलोक में बड़े दुखी हुए हैं, जब यह धन उनके हाथ से निकल गया। आगे परलोक में परमात्मा के दरबार में उन्हें कोई सहारा नहीं मिला ॥ ५ ॥
13हे संतजनो ! इस हरेि-धन का साहूकार हरि आप ही है। जिसे वह यह धन देता है, वही इस को लेकर अपने साथ ले जाता है।
14हे नानक ! गुरु ने यही सूझ दी है कि इस हरि-धन में कभी कोई कमी नहीं आती ॥ ६ ॥ ३॥ १० ॥
15सूही महला ४ ॥
16जिस व्यक्ति पर भगवान् सुप्रसन्न होता है, वही उसका गुणगान करता है, वही उसका सच्चा भक्त होता है एवं उसे स्वीकार होता है।
17जिसके हृदय में भगवान् बस गया है, उसकी महिमा क्या वर्णन की जाए॥ १॥
18दिल लगाकर गोविन्द का गुणगान करना चाहिए तथा सतगुरु में ही ध्यान लगाना चाहिए॥ १॥ रहाउ॥
19वही सतगुरु है और उस सतगुरु की सेवा सफल है, जिससे नाम रूपी परम खजाना मिलता है।
20जो मायावी जीव द्वैतभाव में फँसकर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए विषय-विकारों की दुर्गन्ध को भोगते हैं, अज्ञानी हैं, और उनके सारे कर्म निष्फल हैं।॥ २॥
21जिसे भगवान् पर श्रद्धा होती है, उसका ही स्तुतिगान स्वीकार होता है और वह दरबार में सत्कार पा लेता है।
22जो कपटी इन्सान श्रद्धा के बिना ही झूठमूठ से ऑखें बंद करते रहते हैं, उनका झूठा गुमान दूर हो जाएगा ॥ ३॥
23हे भगवान् ! तू अंतर्यामी है, यह प्राण एवं शरीर इत्यादि जितना भी है, यह सब तेरा ही दिया हुआ है।
24नानक कहता है कि हे ईश्वर ! मैं तेरे दासों का दास हूँ, जो तू मुझ से कहलवाता है, मैं वही बखान करता हूँ॥ ४ ॥ ४॥ ११॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं