गुरु ग्रंथ साहिब 733 · Raag Soohee · Guru Raam Daas Ji
1यदि वह सौ बार भी अभिलाषा करे, उसके मन को कोई प्रेम-रंग नहीं चढ़ता ॥ ३॥
2यदि परमात्मा अपनी कृपा-दृष्टि कर दे तो वह सतिगुरु को पा लेता है।
3हे नानक ! फिर ऐसा इन्सान हरि-रस एवं हरि के प्रेम-रंग में ही समा जाता है। ४ ॥ २ ॥ ६॥
4सूही महला ४ ॥
5जिह्मा हरि-रस पीकर तृप्त रहती है।
6जो गुरमुख बनकर हरि-रस का पान करता है, वह सहज ही समा जाता है॥ १॥
7हे भाई ! यदि तुम हरि-रस चख लोगे तो फिर
8दूसरे स्वादों में क्यों लुब्ध होंगे॥ १॥ रहाउ ॥
9गुरु के मत द्वारा हरि-रस अपने ह्रदय में बसाकर रखो।
10हरि-रस में मग्न हुए भक्तजन प्रभु के प्रेम-रंग में रंग जाते हैं। २॥
11स्वेछाचारी जीव से हरि-रस चखा नहीं जाता।
12वह बड़ा अहंकार करता है, जिसके कारण इसे बहुत सज़ा मिलती है॥ ३॥
13यदि परमात्मा की थोड़ी-सी कृपा-दृष्टि हो जाए तो वह हरि-रस पा लेता है।
14हे नानक ! फिर ऐसा जीव हरि-रस पीकर हरि का गुणगान करता रहता है। ४॥ ३॥ ७ ॥
15सूही महला ४ घरु ६
16ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
17नीच जाति का आदमी भी हरि का नाम जपने से उत्तम पदवी पा लेता है।
18इस बारे चाहे दासी पुत्र विदुर के संबंध में विश्लेषण कर लो, जिसके घर में श्रीकृष्ण ने आतिथ्य स्वीकार किया था ॥ १॥
19हे भाई ! हरि की अकथनीय कथा सुनो, जिससे चिंता, दुख एवं भूख सब दूर हो जाते हैं।॥ १॥ रहाउ ॥
20चमार जाति के भक्त रविदास ईश्वर की उस्तति करते थे और हर क्षण प्रभु की कीर्ति गाते रहते थे।
21वह पतित जाति से महान् भक्त बन गए। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र-इन चारों वर्णो के लोग उनके चरणों में आ लगे ॥ २ ॥
22भक्त नामदेव की प्रीति हरि से लग गई। लोग उन्हें छीपा कहकर बुलाते थे।
23हरि ने क्षत्रिय एवं ब्राह्मणों को पीठ देकर छोड़ दिया और नामदेव की ओर मुख करके उन्हें आदर दिया ॥ ३॥
24ईश्वर के जितने भी भक्त एवं सेवक हैं, अड़सठ तीर्थ उनके माथे का तिलक लगाते हैं।
25यदि जगत् का बादशाह हरि अपनी कृपा करें तो नानक नित्य ही उनके चरण स्पर्श करता रहेगा। ४ ॥ १॥ ८ !!
26सूही महला ४ ॥
27उन्होंने ही अपने मन में हरि की आराधना की हैं, जिनके माथे पर ऐसा भाग्य लिखा हुआ है।
28उनकी निंदा कोई क्या कर सकता है, जिनके पक्ष में रचयिता हरि है॥ १॥
29हे मेरे मन ! सर्वदा हरि का ध्यान करो; यह जन्म-जन्मांतर के सब दुख दूर करने वाला है॥ १॥ रहाउ॥
30हरि ने शुरु से ही भक्तजनों को अपनी भक्ति का अमृतमयी भण्डार दिया हुआ है।
31जो उनकी बराबरी करने की कोशिश करते हैं, वे मूर्ख होते हैं और उनका लोक-परलोक दोनों में मुँह काला (अर्थात् तिरस्कार) होता है॥ २॥
32जिन्हें हरि का नाम प्यारा लगता है, वही उसके भक्त एवं सेवक हैं।
33उनकी सेवा करने से ही हरि पाया जाता है और निंदक के सिर पर राख पड़ती है अर्थात् ये तिरस्कृत होते हैं।॥ ३॥
34केवल वही इस बात को जानता है, जिसके घर में यह दशा घटित हुई है। जगत् के गुरु, गुरु नानक के संबंध में इस बात की विचार कर ली।
35सृष्टि के आदि, युगों के आदि एवं गुरु साहिबान के चारों वंशों में से निंदा करने से किसी ने भी हरि को नहीं पाया अपितु सेवा भावना से ही उद्धार होता है ॥४॥२॥९॥
36सूही महला ४ ॥
37जहाँ भी ईश्वर की आराधना की जाती है, वहाँ ही वह मित्र एवं मददगार बन जाता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं