सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 732 · Raag Soohee · Guru Raam Daas Ji

1हे मेरे मन ! राम-नाम का रंग कर ।

2गुरु ने प्रसन्न होकर जिसे भी उपदेश दिया है, उसे हरि-बादशाह अवश्य ही मिल गया है॥ १॥ रहाउ॥

3ज्ञानहीन मनमुखी जीव-स्त्री का बार-बार जन्म-मरण से संबंध बना रहता है।

4उसे प्रभु कभी याद ही नहीं आया और द्वैतभाव ही उसके मन में बसा रहा ॥ २ ॥

5मैं पापों की मैल से भरा हुआ दुष्कर्मी हूँ। हे भक्तों का पक्ष करने वाले हरेि ! मेरी रक्षा करो।

6जब गुरु ने मुझे नाम रूपी अमृत-सरोवर में स्नान करवाया तो मेरे पापों की मैल मन से उतर गई॥ ३॥

7हे दीनानाथ ! हे दीनदयालु प्रभु ! मुझे सत्संगति में मिला दो।

8मैंने सत्संग में मिलकर प्रेम-रंग पा लिया है, हे नानक ! हरेि का प्रेम-रंग मेरे मन-तन में बस गया है॥ ४॥ ३ ॥

9सूही महला ४ ॥

10जो आदमी हरि-हरि नाम तो जपता है लेकिन नित्य ही दूसरों से छल-कपट करता है, उसका हृदय शुद्ध नहीं होता।

11चाहे वह रोज ही बहुत सारे धर्म-कर्म करता रहता है, पर उसे स्वप्न में भी सुख नहीं मिलता॥ १॥

12ज्ञानी गुरु के बिना भक्ति नहीं होती।

13जिस तरह कोरे कपड़े पर कभी रंग नहीं चढ़ता, चाहे हर कोई अभिलाषा करता रहे। १॥ रहाउ॥

14स्वेच्छाचारी इन्सान का अभिमान रूपी रोग कभी दूर नहीं होता चाहे वह जाप, तपस्या, संयम, व्रत एवं पूजा ही करता रहे।

15उसके अन्तर्मन में अभिमान का बड़ा रोग होता है और द्वैतभाव में फंसकर वह बर्बाद हो जाता है॥ २ ॥

16बाहरी दिखावे के लिए वह धार्मिक वेष धारण करता है और बहुत चतुराई करता है। लेकिन उसका मन दसों दिशाओं में भटकता रहता है।

17अहंत्व में फंसकर वह शब्द की पहचान नहीं करता और बार-बार योनियों के चक्र में आता है॥ ३॥

18हे नानक ! जिस पर प्रभु अपनी कृपा-दृष्टि करता है, उसे सूझ हो जाती है और ऐसा व्यक्ति नाम का ध्यान करता रहता है।

19गुरु की कृपा से वह एक परमात्मा को बूझकर उस में ही समा जाता है। ४॥ ४॥

20सूही महला ४ घरु २

21ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

22गुरु-उपदेश द्वारा मैंने अपनी शरीर रूपी नगरी की भलीभांति खोज की है,

23जिसमें हरि नाम रूपी पदार्थ पा लिया है ॥ १॥

24मेरे मन में हरि-नाम ने शांति बसा दी है।

25इससे क्षण में ही तृष्णा की अग्नि बुझ गई है और गुरु को मिलकर मेरी सारी भूख समाप्त हो गई है॥ १॥ रहाउ ॥

26हे मेरी माई ! मैं हरि का गुणगान करके ही जी रहा हूँ।

27दयालु सतगुरु ने परमात्मा के गुण एवं उसका नाम मेरे मन में बसा दिया है। २॥

28मैंने अपना प्यारा प्रभु ढूंढ लिया है और

29सत्संगति में मिलकर हरि-रस पा लिया है॥ ३॥

30आरम्भ से मस्तक पर लिखे भाग्य के कारण ही मैंने हरि को पाया है।

31हे भाई ! गुरु नानक ने प्रसन्न होकर मुझे हरि से मिला दिया है। ४॥ १॥ ५ ॥

32सूही महला ४ ॥

33हे जीव ! हरि अपनी कृपा करके मन में अपना प्रेम उत्पन्न कर देता है।

34ऐसा इन्सान गुरु के सान्निध्य में रहकर हरि नाम में ही समा जाता है॥ १॥

35हरि के प्रेम-रंग में मग्न हुआ मन सुख की अनुभूति करता है।

36वह सदैव ही दिन-रात आनंद में रहता है और पूर्ण गुरु के शब्द में समा जाता है॥ १ ॥ रहाउ ॥

37जीवन में हर कोई इस प्रेम-रंग की कामना करता रहता है,

38मगर यह प्रेम रूपी गहरा लाल रंग गुरु के माध्यम से ही मन को चढ़ता है॥ २॥

39मूर्ख स्वेच्छाचारी इन्सान कोरे कपड़े की तरह होता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं