गुरु ग्रंथ साहिब 730 · Raag Soohee
1सूही महला १ ॥
2हृदय रूपी बर्तन वही अच्छा है, जो प्रभु को अच्छा लगता है।
3जो हृदय रूपी बर्तन बहुत ही मैला होता है, वह तो धोने से भी शुद्ध नहीं होता।
4जो गुरु के द्वार पर जाता है, उसे सूझ आ जाती है।
5गुरु के द्वार पर धोने से हृदय रूपी बर्तन शुद्ध हो जाता है।
6परमात्मा स्वयं ही मैले एवं अच्छे की समझ देता है।
7कोई यह मत समझ ले कि वह आगे परलोक में जाकर सूझ पा लेगा।
8इन्सान जैसे कर्म करता है, वह तैसा ही बन जाता है।
9हरि का नाम अमृत है और वह स्वयं ही यह देन जीवों को देता है।
10जो व्यक्ति नाम जपता है, वह अपना जन्म संवार कर सम्मानपूर्वक परलोक को जाता है और इस दुनिया में अपनी कीर्ति का डंका बजा जाता है।
11बेचारा मनुष्य तो क्या है, वह यह बाजा तीनों लोकों को सुना जाता है।
12हे नानक ! वह (मनुष्य) आप निहाल हो जाता है और अपने सारे कुल को भवसागर से तार देता है। १॥ ४॥ ६॥
13सूही महला १ ॥
14जो योगी होता है, वह योग साधना करता है। जो गृहस्थी होता है, वह भोग पदार्थों में ही लीन रहता है।
15जो तपस्वी होता है, वह तपस्या ही करता है एवं तीथों में मल-मल कर रनान करत। है॥ १॥
16हे ईश्वर ! यदि कोई बैठकर तेरा स्तुतिगान करेगा तो तेरा सन्देश सुनना चाहूँगा ॥ १॥ रहाउ॥
17जैसा बीज आदमी बोता है, वैसा ही फल वह काटता है। जैसी कमाई करता है, वैसा ही उपयोग करता है।
18यदि कोई नाम रूपी परवाने सहित जाए तो आगे परमात्मा के दरबार में उससे कोई पूछताछ नहीं होती ॥ २ ॥
19जैसा (अच्छा-बुरा) कार्य आदमी करता है, वैसा ही उसे कहा जाता है।
20जीवन की जिस सांस में परमात्मा याद नहीं आता, वह सांस व्यर्थ ही बीत जाती है ॥ ३॥
21यदि कोई खरीददार हो तो मैं अपना यह तन उसे बेच दूंगा,यदि उसके बदले में मुझे परमात्मा का नाम मिलता हो।
22हे नानक ! जिस तन में सत्य-नाम नहीं बसता, वह किसी काम नहीं आता ॥ ४ ॥ ५ ॥ ७ ॥
23सूही महला १ घरु ७
24ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
25गुदड़ी पहन लेना योग नहीं है, हाथ में डंडा पकड़ लेना योग नहीं है और शरीर पर भस्म लगा लेना भी योगसाधना नहीं है।
26कानों में मुद्रा पहन लेना और सिर मुंडवा लेना भी योग नहीं है। सिंगी बजाने से भी योग-साधना नहीं हो सकती।
27योग का मार्ग यूं पाया जाता है कि माया में रहते हुए ही निरंजन अर्थात् माया से निर्लिप्त रहें ॥ १॥
28बातें करने से योग नहीं होता।
29योगी उसे ही कहा जाता है, जो सब को एक दृष्टि से देखता है तथा एक समान समझता है॥ १॥ रहाउ॥
30बाहर श्मशान में रहना योग-साधना नही है और न ही समाधि लगाना योग है।
31देश-परदेस में भ्रमण करना और तीथों मेंस्नान करना भी योग नही है।
32योग की युक्ति यही है केि मोह-माया में रहते हुए माया से निर्लिप्त रहें ॥ २ ॥
33जब सतगुरु मिल जाता है तो मानव का संदेह समाप्त हो जाता है और वह भटकते हुए मन को वश में कर लेता है।
34उसके हृदय में अमृत-नाम का झरना बहने लग जाता है, उसका मन मधुर अनहद ध्वनि को सुनने लगता है और हृदय-घर में विद्यमान परमात्मा के साथ वह लीन रहता है।
35वास्तव में मोह माया में रहकर माया से निर्लिप्त रहना ही योग-युक्ति है॥ ३॥
36हे नानक ! ऐसी योग-साधना करनी चाहिए कि जीवन में मोह-माया से तटस्थ रहा जाए।
37जब अन्तर्मन में बाजे के बिना ही अनहद ध्वनि रूपी सिंर्गी बजती है तो निर्भय पद की प्राप्ति हो जाती है।
38योग का मार्ग इस विधि से ही पाया जाता है कि माया में रहते हुए ही निरंजन अर्थात् माया से निर्लिप्त रहे ॥ ४॥ १ ॥ ८॥
39सूही महला १ ॥
40हे ईश्वर ! वह कौन-सा तराजू है, कौन-सा तुला है, जिसमें मैं तेरे गुणों का भार तोलूं ?
41तेरी महिमा की परख करने के लिए मैं किस सर्राफ को बुलाऊँ ? कौन-से गुरु के पास दीक्षा लूं, और किससे मैं मूल्यांकन कराऊँ ? ॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं