गुरु ग्रंथ साहिब 72 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji
1सतिगुरु ने मुझे उस प्रभु बारे बताया है जिस परमात्मा को पाने की देवता, मानव और ऋषि-मुनि कामना करते हैं। ॥४॥
2सत्संगति किस प्रकार जानी जा सकती है?
3एक प्रभु के नाम का वहाँ उच्चारण होता है।
4हे नानक ! हरिनाम ही ईश्वर का हुक्म है, यह बात मुझे गुरु जी ने समझा दी है ॥५॥
5यह संसार संदेह के कारण भ्रुम भुलैया में पड़ा हुआ है।
6हे प्रभु ! तुमने स्वयं ही प्राणियों के कर्मानुसार उन्हें भुलाया है।
7वे प्राणी जिनके भाग्य में परमात्मा का मिलन नहीं, वियोगिनी स्त्री के समान प्रतिदिन तड़पते रहते हैं। ॥६॥
8दुहागिन नारियों के क्या लक्ष्ण हैं?
9वे पति द्वारा उपेक्षित मान-रहित होकर भटकती रहती हैं।
10उन दुर्भाग्यशाली नारियों की वेश-भूषा मलिन होती है और प्रतिदिन तड़प-तड़प कर रात्रि बिताती हैं ॥७॥
11सुहागिन ने आखिर क्या शुभ कर्म कमाया है?
12उसे ईश्वर ने पूर्व जन्म के किसी उत्तम कर्म का फल प्रदान किया है।
13अपनी कृपा-दृष्टि करके परमेश्वर उनको अपने साथ मिला लेता है ॥८॥
14जिन जिज्ञासु प्राणियों ने परमात्मा के आदेश की पालना की है,
15वे गुरु का सच्चा उपदेश मन में धारण करते हैं।
16ऐसी सखियाँ सत्यवती पत्नी हैं, जो अपने पिया के साथ प्रीति करती हैं ॥९ ॥
17जो ईश्वर की इच्छानुसार प्रसन्नता अनुभव करती हैं,
18उनके भीतर से संदेह निवृत्त हो जाते हैं।
19हे नानक ! सतिगुरु ऐसा दयालु है जो सभी को भगवान के साथ मिला देता है ॥१०॥
20वह सतिगुरु से मिलन करके हरि-नाम रूपी फल प्राप्त कर लेता है।
21जो अपने अहंकार को नाश कर देता है,
22उसकी मंद-बुद्धि की पीड़ा निवृत हो जाती है और उसके मस्तक पर भाग्योदय हो जाता है ॥११॥
23हे प्रभु ! तेरी वाणी अमृत समान है।
24यह तेरे भक्तों के मन में रमी हुई है।
25तुम्हारी सेवा में ही वास्तविक सुख की उपलब्धि है और अपनी कृपा-दृष्टि से तुम अपने भक्तों को भवसागर से पार कर देते हो ॥१२॥
26सतिगुरु से मिलन तभी समझा जाता है।
27यदि इस मिलन द्वारा ईश्वर के नाम का उच्चारण किया जाए।
28सतिगुरु के बिना किसी को भी प्रभु प्राप्त नहीं हुआ। सारी दुनिया धर्म-कर्म करते-करते थक गई है ॥१३॥
29मैं अपने सतिगुरु पर बलिहार जाता हूँ
30जिसने मुझे माया-तृष्णा के भृमों से निकाल कर सद्मार्ग लगाया है।
31यदि सतिगुरु अपनी कृपा-दृष्टि करे तो यह मनुष्य को अपनी संगति में मिला लेता है ॥१४॥
32हे भगवान ! तुम समस्त प्राणियों के भीतर समाए हुए हो।
33ईश्वर ने अपनी ज्योति गुप्त रूप में मनुष्य के हृदय में रखी हुई है।
34हे नानक ! जिस मनुष्य के ह्रदय में ईश्वर ने अपनी ज्योति रखी हुई हैं, ईश्वर गुरु के माध्यम से उस मनुष्य के हृदय में प्रगट हो जाता है। ॥१५॥
35हे ईश्वर ! तुमने ही तन की मूर्ति गढ़कर
36उसमें प्राणों का संचार करके मुझे पैदा किया है।
37अपने दोनों हाथ उसके मस्तक पर रखकर प्रभु अपने सेवक की प्रतिष्ठा बरकरार रखता है ॥१६॥
38समूह अटकलें और चतुराईयाँ किसी काम नहीं आती।
39मेरा प्रभु सब कुछ जानता है।
40ईश्वर ने मेरा प्रताप सब ओर प्रकट किया है और सब मेरी जय-जयकार करने लगे हैं ॥१७॥
41परमात्मा ने मेरे गुणों-अवगुणों पर ध्यान नहीं दिया,
42उसने तो केवल अपने विरद की लाज निभाई है।
43ईश्वर ने अपने गले लगा कर मेरी रक्षा की है और मुझे गर्म हवा भी नहीं छूती ॥१८॥
44अपने तन-मन से मैंने प्रभु की स्तुति की है।
45इसलिए मुझे मनोवांछित फल प्राप्त हुआ है।
46हे ईश्वर ! तुम सम्राटों के भी सम्राट हो, इसलिए हे नानक ! मैं तुम्हारे ही नाम-सिमरन से जीवन धारण करता हूँ ॥१९॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं