गुरु ग्रंथ साहिब 728 · Raag Soohee
1वह अद्वैत ईश्वर (ऑकारस्वरूप) केवल एक है, नाम उसका सत्य है। वह आदिपुरुष सृष्टि को रचने वाला है, सब कुछ करने में परिपूर्ण (शक्तिवान) है। उसे किसी प्रकार का कोई भय नहीं, उसका किसी से कोई वैर नहीं, सब पर समदृष्टि होने के कारण वह प्रेमस्वरूप है। वह कालातीत ब्रह्म मूर्ति सदा अमर है, अतः जन्म-मरण से रहित है, वह स्वजन्मा है, जिसकी लधि गुरु की कृपा से होती है।
2रागु सूही महला १ चउपदे घरु १
3पहले अपने हृदय रूपी बर्तन को विकारों की मैल से शुद्ध करो। फिर बैठकर हृदय रूपी बर्तन को धूप दो अर्थात् मन को स्थिर करके हृदय रूपी मटकी में शुभ गुण बसाओ और फिर दूध लेने के लिए जाओ अर्थात् कर्म करो।
4कर्म ही दूध है, जिसे मंथन करना है। फिर इस दूध को सुरति की जाग लगाओ अर्थात् कर्म करते समय अपनी वृति परमात्मा में लगाकर रखो। निष्काम भावना से दूध को जमा दो अर्थात् कर्म के फल की इच्छा मत रखो ॥ १॥
5केवल परमात्मा का नाम ही जपो,
6अन्य सारे कर्म निष्फल हैं॥ १॥ रहाउ ॥
7यह चंचल मन वश में करना ही हाथों में रस्सी की गोटियाँ पकड़ना है। अज्ञान रूप नींद का न आना ही रस्सी है।
8रसना से भगवान का नाम जपते रहो, तभी कर्म रूपी दूध का मंथन होगा। इस विधि से नाम रूपी अमृत पा लो॥ २ ॥
9आदमी को चाहिए कि वह अपने मन को संपुट अर्थात् परमात्मा का निवास बनाए। वह सत्य रूपी सरोवर में अपने मन को स्नान कराए और भगवान को अपनी श्रद्धा रूपी फूलों की पतियाँ भेंट करके उसे तृप्त करे।
10यदि वह सेवक बनकर अपने प्राणों की पूजा अर्पित करके उसकी सेवा करे तो इस विधि द्वारा उसका मन मालिक-प्रभु में लीन रहेगा।॥ ३॥
11हे ईश्वर ! कहने वाले तेरे बारे सिर्फ बातें ही करते रहते हैं और वे बातें कर-करके दुनिया से जा रहे हैं लेकिन तुम्हारे जैसा अन्य कोई नहीं।
12भक्तिहीन नानक विनती करता है कि मैं उस सच्चे मालिक की हमेशा ही स्तुति करता रहता हूँ॥ ४॥ १॥
13सूही महला १ घरु २
14ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
15हे जीव ! परमात्मा तो तेरे हृदय में ही बसता है, तू उसे ढूंढने के लिए बाहर मत जा।
16तू नाम रूपी अमृत को छोड़कर माया रूपी विष क्यों खा रहा है।॥ १॥
17हे मेरे मन ! ऐसा ज्ञान जपो कि
18उस सच्चे मालिक के चाकर बन जाओ॥ १॥ रहाउ॥
19हर कोई ज्ञान-ध्यान की सिर्फ बातें ही करता है और
20सारा जगत् ही माया के बन्धनों में बँधा हुआ भटक रहा है। २॥
21जो परमात्मा की सेवा करता है, वह उसका चाकर बन जाता है।
22समुद्र, पृथ्वी एवं गगन में वही बसा हुआ है।॥ ३॥
23सच तो यह है कि न हम अच्छे हैं और न ही कोई बुरा है।
24नानक प्रार्थना करता है कि एक परमात्मा ही जीवों को संसार के बन्धनों से मुक्त करवाता है॥ ४॥ १॥ २॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं