गुरु ग्रंथ साहिब 727 · Raag Tilang · Guru Tegh Bahaadur Ji
1इस जगत् को तुम यू जानो कि इसका व्यवहार इन्सान के जीवन तक ही रहता है।
2है नानक! हरि का गुणगान कर लो, क्योकि यह सब कुछ स्वप्न के सामान ही है ॥ २ ॥ २ ॥
3तिलंग महला ९ ॥
4हे मेरे मन ! हरि का यश गा ले, क्योंकि यही तेरा सच्चा साथी है ।
5मेरा कहना मान ले, चूंकि यह जीवन-अवसर बीतता जा रहा है॥ १॥ रहाउ॥
6संपति, रथ, धन एवं राज के साथ तूने बहुत प्यार लगाया हुआ है।
7लेकिन जब काल की फाँसी गले में पड़ेगी तो सबकुछ पराया हो जाएगा ॥१॥
8हे बावले ! तूने जानबूझ कर अपना काम आप ही बिगाड़ लिया है।
9पाप करते वक्त कभी संकोच नहीं किया और न ही तूने अपना अहंकार छोड़ा है॥ २॥
10हे मेरे भाई ! जैसे गुरु ने मुझे उपदेश दिया है, वह भी सुन ले।
11नानक तुझे पुकार कर कहता है कि प्रभु की शरण पकड़ लो ॥ ३॥ ३ ॥
12तिलंग बाणी भगता की कबीर जी
13ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
14हे जिज्ञासु ! वेद-(ऋगवेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वेद) तथा कतेब (तौरेत, जंबूर, बाईबल एवं कुरान) का ज्ञान पढ़ने से भी दिल का फिक्र दूर नहीं होता।
15यदि एक पल भर के लिए अपने चंचल मन को वश कर लोगे तो खुदा तुम्हारे सामने प्रत्यक्ष दिखाई देगा ॥ १॥
16हे मनुष्य ! हर रोज खुदा को अपने दिल में ही खोज और परेशानी में मत भटकते रहो।
17यह जो दुनिया है, यह खुदा का बनाया हुआ एक जादू का मेला है, इसने मदद नहीं करनी ॥ १॥ रहाउ॥
18लोग झूठा ज्ञान पढ़-पढ़कर बड़े खुश होते हैं और बेखबर होने के कारण वाद-विवाद करते रहते हैं।
19सच्चा परमात्मा अपनी बनाई हुई दुनिया में ही बसता है और वह श्याम मूर्ति नहीं है॥ २ ॥
20आसमान में नाम रूपी दरिया बहता है, तुझे उस में स्नान करना चाहिए।
21तू सदा ही फकीरी अर्थात् खुदा की बंदगी कर, ज्ञान रूपी चश्मा लगाकर देख, अल्लाह तुझे हर जगह मौजूद नजर आएगा ॥ ३॥
22अल्लाह पाक-पवित्र है। इस बात में शक तो ही करो, यदि उसके अलावा कोई दूसरा हो।
23हे कबीर ! यह सब उस करीम का ही कर्म है, जो उसे ठीक लगता है, वही करता हैं।॥ ४ ॥ १॥
24नामदेव जी ॥
25हे मालिक ! तेरा नाम ही मुझ अंधे (ज्ञानहीन) को लकड़ी के समान सहारा है।
26मैं गरीब एवं मसकीन हूँ और तेरा नाम ही मेरा आसरा है॥ १॥ रहाउ॥
27हे करीम, रहीम, अल्लाह ! तू ही धनवान है।
28तू ही जीव के सामने साक्षात् है! तू हर समय मेरे अन्दर एवं मेरे सामने रहता है॥ १॥
29तू दया का दरिया है, तू ही दाता है, तू ही बेअंत है और तू ही धनी है।
30एक तू ही जीवों को सबकुछ देता और लेता है, तेरे सिवा अन्य कोई नहीं॥ २॥
31तू चतुर है और तू सब को देखने वाला है। मैं तेरे गुणों का क्या विचार करूं ?
32हे नामदेव के स्वामी ! तू सब पर अपनी कृपा करने वाला है॥ ३ ॥ १॥ २ ॥
33हे मेरे मित्र ! हे मेरे यार खुशखबरी सुनो !
34(हे प्रभु !) तुझ पर बार-बार बलिहारी जाता हूँ।
35मुझे तेरी बेगार बड़ी अच्छी लगती है और तेरा नाम बड़ा प्यारा लगता है॥ १॥ रहाउ॥
36तू कहाँ से आया है, तू कहाँ गया था और तूने अब कहाँ जाना है
37यह द्वारिका नगरी है, यहाँ सत्य ही बोलना। ॥ १॥
38तेरी पगड़ी बहुत सुन्दर है और तेरे बोल बड़े मीठे हैं।
39द्वारिका नगरी में कोई मुगल कैसे हो सकता है॥ २॥
40ब्रह्माण्ड के हजारों भवनों का सिर्फ एक तू ही सुलतान है।
41हमने तुझे सांवले रंग के बादशाह के रूप में ही पहचान लिया है अर्थात् तू ही कृष्ण है।॥ ३॥
42तू ही अश्वपति सूर्यदेव है, तू ही गजपति इन्द्रदेव है, तू ही नरों का नरेश ब्रह्मा है।
43हे नामदेव के स्वामी ! तू मीर मुकुन्द है॥ ४॥ २ ॥ ३ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं