सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 726 · Raag Tilang · Guru Raam Daas Ji

1जो गुरु के शिष्य अपने गुरु की सेवा करते हैं, वे उत्तम प्राणी हैं।

2नानक उन पर ही न्योछावर है और सदा उन पर कुर्बान जाता है॥ १०॥

3गुरुमुख सखी-सहेलियाँ आप हरि को अच्छी लगी हैं।

4हरि के दरबार में उन्हें शोभा का वस्त्र पहनाया है और हरि ने स्वयं ही उन्हें अपने गले से लगाया है॥ ११॥

5हे प्रभु ! जो गुरुमुख तेरे नाम का ध्यान करते हैं, मुझे उनके दर्शन दीजिए।

6मैं उनके चरण धोता हूँ और उनकी चरण-धूलि घोल-घोलकर पीता हूँ॥ १२॥

7जो जीव-स्त्रियाँ पान-सुपारी खाती हैं और मुँह पर लिपस्टिक लगाती हैं,

8और हरि को कभी याद नहीं करती तो यम उन्हें पकड़कर आगे लगा लेता है॥ १३ ॥

9जिन्होंने हरि को याद किया है और हरि-नाम को अपने हृदय में बसाया है, यम उनके निकट नहीं आता वे गुरु के शिष्य गुरु के प्यारे होते हैं।॥ १४॥

10हरि का नाम सुखों का भण्डार है लेकिन कोई गुरुमुख ही इस भेद को जानता है।

11हे नानक ! जिन्हें सतिगुरु मिल गया है, वे खुशियाँ मनाते हैं॥ १५॥

12सतिगुरु को दाता कहा जाता है, जो खुश होकर नाम-देन की कृपा करता है।

13मैं गुरु परं सदा ही कुर्बान जाता हूँ, जिसने मुझे परमात्मा का नाम दिया है ॥१६॥

14वह गुरु धन्य है, मेरी उसे शाबाश है, जो मुझे हरि का संदेश देता है।

15मैं गुरु को देख-देखकर खुश हो गया हूँ और उस गुरु का रूप बहुत सुन्दर है॥ १७॥

16गुरु की रसना अमृत रूपी नाम बोलती है और वह हरि नाम बोलती हुई बड़ी सुन्दर लगती है।

17जिन्होंने गुरु की शिक्षा को सुनकर उस पर भरोसा किया है, उनकी सारी भूख दूर हो गई है॥ १८ ॥

18मुझे बताओ, उस मार्ग पर किंस विधि द्वारा जाया जाता है, जिसे हरि का मार्ग कहा जाता है।

19हे हरि ! जो तेरा हरि-नाम है, उस नाम को यात्रा खर्च के तौर पर अपने साथ ले जाना चाहिए॥ १६॥

20जिन गुरुमुखों ने हरि की आराधना की है, वे बड़े शाह एवं चतुर हैं।

21मैं सतिगुरु पर सदा ही कुर्बान जाता हूँ और गुरु के वचनों में लीन रहता हूँ॥ २०॥

22हे हरि ! तू ही मेरा स्वामी है, तू ही मेरा मालिक है, तू ही मेरा बादशाह है।

23यदि तुझे अच्छा लगे तो ही तेरी बंदगी कर सकता हूँ, तू गुणों का गहरा सागर है॥ २१॥

24हरि स्वयं ही एक रंग वाला है और स्वयं ही बहुरंगी है।

25हे नानक ! जो उस प्रभु को अच्छा लगता है, मेरे लिए वही बात अच्छी है॥ २२॥ २॥

26तिलंग महला ९ काफी

27ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

28हे प्राणी ! यदि तूने परमेश्वर को याद करना है तो हर पल याद कर ले।

29जैसे फूटे हुए घड़े में से पानी निकलता रहता है, वैसे ही क्षण-क्षण तेरी जीवन-अवधि बीतती जा रही है॥ १॥ रहाउ॥

30हे मूर्ख अज्ञानी ! तू ईश्वर के गुण क्यों नहीं गाता ?

31झूठे लालच में लगकर तूने अपनी मृत्यु को भी नहीं पहचाना॥ १॥

32अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं है, जो प्रभु का गुणगान कर लेगा।

33हे नानक ! उस प्रभु का भजन करने से जीव निर्भय पद पा लेता है॥ २॥ १॥

34तिलंग महला ९ ॥

35हे मेरे मन ! अज्ञानता की नीद से जाग ले। तू क्यों गाफिल होकर सोया हुआ है।

36जो तन जीव के साथ ही उत्पन्न हुआ है, वह कभी साथ नहीं गया ॥ १॥ रहाउ॥

37जिस माता-पिता, पुत्रों एवं संबंधियों के साथ तूने बहुत स्नेह किया था,

38जब तेरी देहि रो प्राण ही छूट गए तो उन्होंने तेरी देहि को अग्नि में डाल दिया है॥ १॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं