गुरु ग्रंथ साहिब 721 · Raag Tilang
1रागु तिलंग महला १ घरु १
2ईश्वर एक है, उसका नाम सत्य है, वह आदिपुरुष संसार का रचनहार है, सर्वशक्तिमान है, अभय है, वैर भावना से रहित होने के कारण प्रेमस्वरूप है, वह कालातीत ब्रह्म-मूर्ति सदा अमर है, अतः जन्म-मरण के चक्र से रहित है, स्वजन्मा है अर्थात् स्वयं प्रकाशमान हुआ, जिसे गुरु-कृपा से पाया जाता है।
3हे करतार ! मैंने तेरे पास एक अर्ज की है, जरा इसे कान लगाकर ध्यान से सुन।
4तू सदैव सत्य है, बहुत बड़ा है, कृपा करने वाला है, तुझमें किसी प्रकार का कोई ऐब नहीं, अपितु सबका पोषक है॥ १॥
5हे मेरे दिल ! तू यह सत्य जान ले कि यह दुनिया नाश होने वाला मुकाम है।
6तू कुछ भी नहीं जानता कि मृत्यु के फरिश्ते इजराईल ने मेरे सिर के बाल पकड़े हुए हैं।॥ १॥ रहाउ॥
7स्त्री, पुत्र, पिता एवं भाई-इन में से कोई भी मेरा मददगार नहीं है।
8जब आखिर में मेरी मृत्यु आ जाएगी और मृतक शरीर को दफनाने की नमाज पढ़ी जाएगी, तब कोई भी मुझे यहाँ रख नहीं सकेगा ॥ २॥
9मैं जीवन भर लालच में ही भटकता रहा, बुराई का ही ख्याल करता रहा।
10मेरी दशा यह है कि मैंने कभी कोई भलाई का कार्य नहीं किया।॥ ३॥
11मुझ जैसा दुनिया में कोई बदनसीब, चुगलखोर, गाफिल, निर्लज्ज एवं निडर नहीं है।
12दास नानक यही कहता है कि हे प्रभु! मुझ पर ऐसी मेहर करो कि तेरे सेवकों की चरण-धूलि मिल जाए॥ ४॥ १॥
13तिलंग महला १ घरु २
14ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
15हे मालिक ! तेरा डर मेरी भाँग है और मेरा चित इस भॉग को पाने वाला चमड़े का थेला
16में डर रूपी भाँग को पीकर दिवाना एवं विरक्त बन गया हूँ।
17मुझे तेरे दर्शनों की भूख लगी है और मेरे दोनों हाथ तेरे द्वार पर भीख माँगने के खप्पर हैं।
18मैं नित्य ही तेरे द्वार पर दर्शनों की भीख माँगता रहता हूँ॥ १॥
19मैं तेरे दर्शन ही माँगता हूँ।
20मैं भिखारी तेरे द्वार पर हा हूँ, मुझे दर्शनों की भीख दो ॥ १॥ रहाउ॥
21केसर, फूल, कस्तूरी एवं सोना इत्यादि सबने पर चढ़ना होता है।
22ऐसी चन्दन जैसी भक्तों में ज्योति बसती है, जो सबको अपनी ज्ञान सुगन्धि देती है॥ २॥
23घी एवं रेशम को कोई बुरा नहीं कहता।
24हे प्रभु ! तेरा भक्त भी ऐसा ही होता है कि कोई भी उसे बुरा नहीं कहता चाहे वह ब्राहाण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र किसी भी जाति में से हो।
25जो तेरे नाम में लीन रहते हैं और तुझ में वृत्ति लगाए रखते हैं,
26नानक की विनती है कि हे मालिक ! उनके द्वार पर अपने दर्शनों की भिक्षा दो ॥ ३ ॥ १॥ २ ॥
27तिलंग महला १ घरु ३
28ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
29हे मेरे प्यारे ! मेरा यह तन रूपी चोला माया की लाग से लग गया है और मैंने इसे लालच रूपी रंग में रंग लिया है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं