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गुरु ग्रंथ साहिब 71 · Siree Raag · Guru Arjan Dev Ji

1तब भी यदि उसका मन पारब्रह्म के निर्मल नाम से रहित है तो उसे ले जाकर कुंभी नरक में फॅक दिया जाता है॥ ७॥

2यदि काया भी पूर्णतः नीरोग है और कोई रोग नहीं, यदि उसको कोई शोक-संताप नहीं,

3वह मृत्यु का ख्याल तक भी नहीं करता हो और दिन-रात भोग विलास में लीन रहता है,

4यदि उसने भुजबल से सबको अपने अधीन कर लिया है और उसके मन में कोई भय भी न हो,

5यदि वह परमात्मा को स्मरण नहीं करता तो वह यमदूत के वश में आ जाता है॥८॥

6जिस पर भगवान अपनी कृपा करता है, उसे साधु-संतों की संगति प्राप्त होती है।

7ज्यों ज्यों सत्संग में चित्त लगता है, उतना ही ज्यादा उस प्रभु के साथ प्रेम प्रगाढ़ हो जाता है।

8परमात्मा ही लोक-परलोक का स्वामी है, उसके बिना प्राणियों के सुख का और कोई आधार नहीं।

9परन्तु उस परमेश्वर के पवित्र नाम की प्राप्ति सतिगुरु की प्रसन्नता से ही होती है। हे नानक ! यदि सतिगुरु प्रसन्न हो जाए तो मनुष्य को सत्य नाम की उपलब्धि हो जाती है॥९॥१॥२६॥

10श्रीरागु महला ५ घरु ५ ॥

11मैं नहीं जानता कि प्रभु को कौन-सी बातें अच्छी लगती हैं।

12हे मेरे मन ! प्रभु को प्रसन्न करने का मार्ग खोज ॥१॥ रहाउ ॥

13ध्यानी इन्सान समाधि लगाकर भगवान में ध्यान लगाता है।

14ज्ञानी ज्ञान-मार्ग द्वारा प्रभु को समझने का प्रयास करता है।

15परन्तु कोई विरला पुरुष ही भगवान को जानता है ॥१॥

16भगवती जन अपनी धार्मिक क्रियाओं में लीन रहता है।

17योगी अष्टांग-भाव से मुक्ति की कल्पना करते हैं।

18तपस्वी लोग तपस्या में ही कल्याण मानते हैं। ॥२॥

19मौनी साधु मौन धारण करने में ही ईश्वर की प्राप्ति संभव मानते हैं।

20संन्यासी ब्रह्मचारी बन गया है।

21उदासी वैराग्य में मग्न हुआ है ॥३॥

22कोई कहता है कि वह नौ प्रकार की भक्ति करता है।

23पण्डित वेदों को सस्वर उच्चारण करते हैं।

24गृहस्थ-जन धर्मशास्त्रानुसार यज्ञ-दानादि धर्मो के पालन में ही कल्याण समझते हैं ॥४॥

25कोई साधु एक नाम ‘अलख' ही बोलता है। कोई साधु बहुरूपिया बन गया है।

26कापड़िए साधु केसरिया कपड़े पहनते हैं, जागूता अर्थात् रात्रि जागरण करने वाले लोग भी जगराते में ही मोक्ष सम्भव मानते हैं।

27कुछ लोग तीर्थ-यात्रा में स्नान द्वारा भी प्रभु-प्राप्ति की संभावना स्वीकारते हैं ॥५॥

28निराहार रहने वाले व्रत को ही ईश्वर मिलन का साधन मानते हैं, ऊँची जाति के लोग निम्न जाति से परहेज करते हैं।

29कुछ लोग गुफाओं में छिपे रहते हैं और किसी को अपने दर्शन नहीं देते।

30कुछ लोग अपने चित्त के भीतर ही बुद्धिमान हैं। ॥६॥

31कोई भी अपने आपको कम नहीं कहता।

32हर कोई कहता है कि उसने भगवान को पा लिया है।

33लेकिन भगवान का भक्त वही होता है जिसे भगवान अपने साथ मिला लेता है ॥ ७॥

34मैं समस्त युक्तियों एवं उपाय त्याग कर भगवान की शरण में आ गया हूँ।

35हे नानक ! भगवान की प्राप्ति हेतु गुरु के चरणों में पड़ना सर्वोत्तम युक्ति है ॥८॥२॥२७॥

36ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

37श्रीरागु महला १ घरु ३ ॥

38हे ईश्वर ! तू सृष्टि में अनेक रूपों में विचरण कर रहा है। योगियों में तुम योगीराज हो

39एवं भोगिर्यो में तुम महाभोगी हो।

40स्वर्ग लोक के देवता, मृत्युलोक के वासी तथा पाताल के नागादि जीवों ने तुम्हारा भेद नहीं पाया ॥१॥

41मैं तुझ पर कुर्बान हूँ, मैं तेरे पावन नाम पर न्यौछावर हूँ ॥१॥ रहाउ॥

42तुम सृष्टि कर्ता हो, तुम ने ही संसार की रचना करके

43उनकी किस्मत निर्धारत करके सांसारिक कार्यों में लगाया है।

44अपनी रचना का तुम स्वयं ध्यान रखते हो और अपनी माया-शक्ति से इस संसार की चौपड़ पर निरन्तर पासा फेँक रहे हो ॥२॥

45समूचे विश्व में तुम प्रत्यक्ष दिखते हो।

46प्रत्येक प्राणी तेरे नाम की कामना करता है।

47किन्तु सतिगुरु के बिना तुम्हें कोई भी प्राप्त नहीं कर सकता। समस्त प्राणी मोह-माया के जाल में लुभायमान होकर फंसे हुए हैं। ॥३॥

48मैं सतिगुरु पर बलिहार जाता हूँ,

49जिनके मिलन से परमगति प्राप्त होती है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं