गुरु ग्रंथ साहिब 716 · Raag Todee
1टोडी महला ५ घरु ५ दुपदे
2ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
3मेरे प्रभु ने मुझ पर ऐसा उपकार किया है कि
4मेरे पाँच दोष-काम, क्रोध, लोभ, मोह, घमण्ड तथा अहंकार की बीमारी को इस शरीर से दूर कर दिया है॥रहाउ॥
5उसने मेरे बन्धनों को तोड़कर, विषय-विकारों से स्वतंत्र करवा कर मेरे हृदय में गुरु के शब्द को स्थापित कर दिया है।
6उसने मेरे रूप एवं कुरूपता की ओर बिल्कुल विचार नहीं किया और मुझे प्रेम से पकड़कर अपने हरि-रंग में भिगो दिया है॥ १॥
7अब बीच का भ्रम का पर्दा दूर होने से प्रियवर के दर्शन हो गए हैं, जिससे मेरा चित्त बड़ा आनंदित एवं हर्ष से तृप्त हो चुका है।
8हे नानक ! यह शरीर रूपी घर उस प्रभु का ही है, वही हमारा ठाकुर है और हम उसके अधीनस्थ हैं। २ ॥ १ ॥ २०॥
9टोडी महला ५ ॥
10हे मेरी माँ ! मेरे मन की प्रीति परमात्मा से लग गई है।
11यह प्रीति ही मेरा कर्म, धर्म एवं पूजा है और राम-नाम का भजन ही मेरा निर्मल आचरण है॥रहाउ॥
12सर्वदा ही उस प्रभु के दर्शन प्राप्त करना मेरे जीवन का अमूल्य धन एवं प्राणों का आधार है।
13मार्ग एवं किनारे पर प्रभु के प्रेम का यात्रा-व्यय मेरे साथ है चूंकि अपने मन को मैंने भगवान का साथी बना लिया है। १॥
14संतों के आशीर्वाद से मेरा मन शुद्ध हो गया है तथा भगवान ने कृपा करके मुझे अपना बना लिया है।
15हे नानक ! ईश्वर का भजन-सिमरन करने से ही सुख की उपलब्धि हुई है, सृष्टि-रचना एवं युगों के आरम्भ से ही वह अपने भक्तों का घनिष्ठ मित्र है। २॥ २ ॥ २१॥
16टोडी महला ५ ॥
17हे प्रभु जी ! तुम ही मेरे प्राण हो, अत: मुझे मिलो।
18मेरे हृदय से एक पल भर के लिए भी विस्मृत मत होइए और अपने भक्त को पूर्ण नाम दान दीजिए। रहाउ॥
19हे मेरे प्रियतम, हे अन्तर्यामी ! तू बड़ा चतुर एवं बुद्धिमान है, अत: मेरा भ्रम दूर करके मेरी रक्षा करो।
20हे माननीय प्रभु! मुझ पर अपनी अमृत-दृष्टि धारण करो, चूंकि तेरा नाम ही मेरे लिए राज के करोड़ों सुखों एवं धन-दौलत के बराबर है॥१ ॥
21हे समर्थ प्रभु! मेरी रसना आठों प्रहर तेरा गुणगान करती है और तेरा यश सुनकर मेरे कान पूर्णतया तृप्त हो जाते हैं।
22हे जीवों के दाता ! मैं तेरी ही शरण में आया हूँ और नानक तुझ पर सदा-सर्वदा ही कुर्बान जाता है। २॥ ३ ॥ २२॥
23टोडी महला ५ ॥
24हे प्रभु! मैं तेरे चरणों की धूल चाहता हूँ।
25हे दीनदयाल ! हे प्रियतम ! हे मनमोहन ! कृपा करके मेरी अभिलाषा पूरी करो।रहाउ॥
26हे अन्तर्यामी प्रभु! तू सदैव ही मेरे साथ रहता है और तेरा यश दसों दिशाओं में फैला हुआ है।
27हे सृष्टिकर्ता ! जो व्यक्ति तेरा यशोगान करते हैं, वे कभी भी दु:खी होकर नहीं मरते।१॥
28संतों-महापुरुषों की संगति करने से उनके माया के बन्धन धंधे एवं समस्त चिन्ताएँ मिट जाती हैं।
29हे नानक ! इस मन की जितनी भी सुख-संपति एवं भोग इत्यादि है, वे सभी भगवान के नाम के बिना क्षणभंगुर ही समझो। २॥ ४ ॥ २३॥
30टोडी महला ५ ॥
31हे मेरी माई! मेरे मन की प्यास बुझती नहीं अर्थात् प्रभु-दर्शनों की प्यास बनी हुई है।
32मैं तो अपने प्रियतम-प्रभु के बिना एक क्षण भर के लिए भी रह नहीं सकता और मेरे मन में उसके दर्शन करने की आशा ही बनी हुई है॥रहाउ॥
33मैं तो उस निरंजन सृष्टिकर्ता का ही नाम सिमरन करता हूँ, जिससे मेरे मन एवं तन के सभी पाप नाश हो गए हैं।
34वह पूर्ण परब्रह्म सदा सुख देने वाला और अनश्वर है, जिसका यश बड़ा पवित्र है॥१॥
35संतों की अपार कृपा से मेरे सभी मनोरथ पूरे हो गए हैं और गुणों का भण्डार परमात्मा अपनी कृपा करके मुझे मिल गया है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं