गुरु ग्रंथ साहिब 710 · Raag Jaithsree · Guru Arjan Dev Ji
1मेरे मन में प्रज्वलित तृष्णा की अग्नि बुझ गई है तथा प्रभु स्वयं ही मेरा रखवाला बना है।
2हे नानक ! जिसने यह पृथ्वी उत्पन्न की है, उस प्रभु का जाप करो ॥ २॥
3पउड़ी ॥
4जब प्रभु दयालु हो गया तो माया मुझे प्रभावित नहीं करती।
5एक परमेश्वर का ध्यान करने से करोड़ों पाप नाश हो गए हैं।
6संतजनों की चरण-धूलि में स्नान करने से शरीर शुद्ध हो गया है।
7जब पूर्ण प्रभु प्राप्त हुआ तो मन एवं तन सन्तुष्ट हो गए।
8फिर मेरे परिवार के सदस्य एवं वंशावलि मेरे साथ भवसागर से पार हो गए॥ १८ ॥
9श्लोक॥
10गुरु ही गोविंद एवं गुरु ही गोपाल है और गुरु ही पूर्ण नारायण का रूप है।
11हे नानक ! गुरु ही दया का सागर है, वह सर्वकला समर्थ है और वही पतितों का उद्धार करने वाला है॥ १॥
12यह भवसागर बड़ा विषम एवं भयानक है किन्तु गुरु रूपी जहाज के द्वारा मैं इस भवसागर से पार हो गया हूँ।
13हे नानक ! पूर्ण भाग्य से ही सतगुरु के चरणों में लगा हूँ॥ २॥
14पउड़ी ॥
15वह गुरुदेव धन्य-धन्य है, जिसकी संगति में भगवान का सिमरन किया जाता है।
16जब गुरु कृपा के घर में आया तो तमाम अवगुण लुप्त हो गए।
17परब्रह्म गुरुदेव ने मुझे निम्न से उच्च बना दिया है।
18उसने माया के दुखों के बन्धन को काटकर हमें अपना दास बनाया है।
19अब हमारी रसना भगवान का यश एवं उसका गुणगान करती रहती है।॥ १६ ॥
20श्लोक॥
21एक परमेश्वर ही सर्वत्र दिखाई दे रहा है, एक वही सब जगह सुना जा रहा है और एक वही सारी सृष्टि में व्यापक हो रहा है।
22हे दयालु परमेश्वर ! कृपा करो, क्योंकि नानक तो तुझसे नाम-दान की ही याचना कर रहा है॥ १॥
23मैं तो उस एक परमेश्वर की ही उपासना करता हूँ, उस एक को ही स्मरण करता हूँ तथा एक के समक्ष ही प्रार्थना करता हूँ।
24हे नानक ! मैंने तो नाम पदार्थ एवं नाम धन ही संचित किया है, क्योंकि यह नाम धन ही सच्ची पूंजी है॥ २॥
25पउड़ी॥
26प्रभु वड़ा दयालु एवं बेअन्त है और एक वही सर्वव्यापक है।
27वह आप ही सबकुछ है, फिर उस जैसा मैं अन्य किसे कहूँ?
28हे प्रभु ! तुम स्वयं ही दान करते हो और स्वयं ही दान लेते हो।
29जन्म एवं मृत्यु सब तेरे हुक्म में ही है और तेरा पावन धाम सदा अटल है।
30नानक तो तुझसे नाम का दान ही माँगता है, इसलिए कृपा करके मुझे अपना नाम प्रदान करो॥ २०॥ १॥
31जैतसरी बाणी भगता की
32ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
33हे मालिक ! मैं कुछ भी नहीं जानता,
34क्योंकि मेरा यह मन माया के हाथ बिक चुका है॥ १॥ रहाउ॥
35हे स्वामी ! तुझे सारे जगत का गुरु कहा जाता है,
36किन्तु मैं कलियुग का कामी कहलाता हूँ॥ १॥
37इन कामादिक पाँच विकारों ने मेरा मन दूषित कर दिया है,
38क्योंकि ये हर क्षण प्रभु से मेरी अंतरात्मा को दूर करते रहते हैं।॥ २ ॥
39मैं जिधर भी देखता हूँ, उधर ही दु:खों की राशि है।
40चाहे वेद इस बात के साक्षी हैं, परन्तु अभी भी मेरा मन इस सत्य को स्वीकार नहीं कर रहा कि विकारों का फल दु:ख हैं।॥ ३॥
41गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या एवं पार्वती के स्वामी शिव का क्या हाल हुआ ? (गौतम ऋषि के शाप से अहल्या पत्थर बन गई थी और अहल्या से देवराज इन्द्र द्वारा छलपूर्वक भोग करने के कारण उसके शरीर पर हजारों भग के चिन्ह बन गए थे।) ब्रह्मा का अपनी कन्या पर कुदृष्टि रखने के कारण उमापति शिव ने जब ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काटा तो वह सिर शिव के हाथ से ही चिपक गया था॥ ४॥
42इन कामादिक विकारों ने मेरे मूर्ख मन पर बड़े आक्रमण किए हैं किन्तु
43यह मन बड़ा निर्लज्ज है, जो अभी भी इसकी संगति नहीं छोड़ रहा ॥ ५ ॥
44रविदास जी कहते हैं कि अब मैं कहाँ जाऊँ और क्या करूँ ?
45अब परमेश्वर के सिवाय किस की शरण ली जाए॥ ६॥ १ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं