गुरु ग्रंथ साहिब 70 · Siree Raag · Guru Amar Daas Ji
1इस संसार को मोह-तृष्णा की अग्नि में जलता देखकर जो जिज्ञासु प्राणी भागकर सतिगुरु की शरण लेते हैं।
2सतिगुरु उनकें हृदय में भगवान का सत्य नाम बसा देते हैं और उन्हें संयम द्वारा सदैव ही सत्य प्रभु के नाम में रहने का जीवन जीना सिखा देते हैं।
3भवसागर से पार होने के लिए सतिगुरु शाश्वत जहाज है। शब्द द्वारा ही भवसागर से पार हुआ जाता है॥६॥
4विमुख प्राणी चौरासी लाख योनियों के अन्दर भटकते रहते हैं और गुरु के बिना उन्हें मुक्ति नहीं मिलती।
5बड़े-बड़े पण्डित धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन करते और मौनधारी साधु समाधि लगाकर थक गए हैं, किन्तु द्वैत-भाव में लीन होने के कारण वह अपनी प्रतिष्ठा गंवा देते हैं।
6केवल सतिगुरु ने ही उपदेश प्रदान किया है कि सत्य ईश्वर के सिवाय जगत् में मोक्ष का अन्य कोई साधन नहीं ॥७॥
7जिन्हें सत्य प्रभु ने अपने नाम-सिमरन में लगाया था, वहीं सत्य प्रभु के नाम सिमरन में लगे थे। फिर वे सदैव निर्मल कर्म करते रहे।
8उन्होंने मरणोपरांत अपने आत्मस्वरूप में निवास प्राप्त कर लिया है और सच्चे महल में ही रहते हैं।
9हे नानक ! भक्तजन सदैव सुखी रहते हैं। वे सत्य प्रभु के नाम में समा जाते हैं॥८॥१७॥८॥२५॥
10श्रीरागु महला ५ ॥
11यदि किसी व्यक्ति पर भारी विपत्ति आ जाए, उसे बचाने के लिए कोई उसकी मदद न करे,
12उसे मारने के लिए उसके दुश्मन उसके पीछे फिरते हों, यदि उसके रिश्तेदार भी उसका साथ छोड़कर भाग गए हों,
13उसका हर प्रकार का सहारा खत्म हो गया हो।
14यदि ऐसी विपत्ति के समय उसे भगवान स्मरण हो जाए तो उसको गर्म हवा भी नहीं छू सकती ॥१॥
15भगवान निर्बलों का बल है।
16वह जन्मता एवं मरता नहीं, सदैव स्थिर अर्थात् अनश्वर है। गुरु के शब्द द्वारा सत्य प्रभु को समझ लो ॥१॥ | रहाउ॥
17यदि कोई मनुष्य अति दुर्बल है और भूख मिटाने के लिए भोजन का अभाव है और तन ढांपने के लिए वस्त्र भी नहीं,
18यदि उसके पास कोई धन-राशि नहीं और न ही उसको कोई दिलासा देने वाला है।
19यदि कोई भी उसका मनोरथ व इच्छाएँ पूर्ण न करे और उसका कोई भी कार्य सम्पूर्ण न हो।
20यदि वह अपने हृदय में उस पारब्रह्म का स्मरण कर ले तो उसका शासन सदैव स्थिर हो जाता है॥ २॥
21जिसे अधिक चिन्ता लगी हो, उसकें शरीर को बहुत सारे रोग लगे हों।
22जो गृहस्थ में पारिवारिक दुःखों-सुखों में घिरा हुआ है और किसी समय हर्ष एवं किसी समय शोक अनुभव करता हो
23और चारों दिशाओं में भटकता फिरता है और एक क्षण भर के लिए भी बैठ अथवा निद्रा नहीं कर सकता।
24यदि वह पारब्रह्म परमेश्वर की आराधना करे तो उसका तन-मन शीतल हो जाते हैं ॥३॥
25जिस प्राणी को काम-क्रोध-मोह आदि ने अपने वश में कर रखा है और जो धन-दौलत के निरन्तर लोभ में कृपण (कंजूस) बना रहता है,
26जिसने चारों ही व्रज पाप एवं अन्य कुकर्म किए हों, दानव-प्रवृत्ति के कारण निर्दयता पूर्वक जिसने जीव-हत्या की हो,
27जिसने कभी कोई धर्म-पुस्तक उपदेश अथवा ईश्वर–प्रेम की कविता तक न सुनी हो,
28यदि क्षण भर के लिए भी वह मन प्रभु का नाम सिमरन कर ले तो इस भवसागर से पार हो जाता है। ॥४॥
29चाहे प्राणी को चारों वेद, छः शास्त्र और समस्त स्मृतियाँ कण्ठाग्न हों;
30चाहे वह पश्चातापी, महान ऋषेि एवं योगी हो; और अठसत तीथों की यात्रा करे
31और चाहे वह छः संस्कारों द्वारा कर्मो को करता हो और सुबह एवं शाम स्नान करके उपासना करता हो,
32फिर भी यदि उसकी प्रीति परमात्मा के रंग में नहीं रंगी गई तो वह निश्चत ही नरक को जाएगा ॥५॥
33चाहे मनुष्य के पास राज्याधिकार, धन-सम्पत्ति, शासन एवं अन्य असंख्य स्वादिष्ट भोग हो,
34उसके पास मनोहर व सुन्दर उद्यान हो और जिसके आदेश की सब पालना करते हों,
35अथवा रंग तमाशों के विषय विलास में आसक्त व्यक्ति हों,
36फिर भी यदि वह भगवान का सिमरन नहीं करता, तो वह सर्प-योनि में जन्म लेता है ॥६॥
37मनुष्य यदि धनवान, सदाचारी, निर्मल व्यवहारी तथा सर्वप्रिय हो,
38उसे माता-पिता, सुत-भाई एवं अन्य स्वजनों से अनुराग भी हों,
39उसके पास शस्त्र हो, सेना हो और असंख्य लोग उसकी चापलूसी करते हों,
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं