सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 709 · Raag Jaithsree · Guru Arjan Dev Ji

1तेरी चरण-धूलि मिलने से मेरा यह शरीर पवित्र-पावन हो सकता है।

2हे परब्रह्म, हे गुरुदेव ! करुणा करो ताकि मैं सर्वदा ही तेरी उपासना में उपस्थित रह सकूं ॥ १३॥

3श्लोक॥

4जो अपनी रसना से परमेश्वर का नाम उच्चरित करते हैं, अपने कानों से अमृत शब्द सुनते रहते हैं।

5हे नानक ! मैं उन पर सर्वदा ही कुर्बान जाता हूँ, जिनका ध्यान परब्रह्म में लगा रहता है॥ १॥

6एक परमात्मा की भक्ति के बिना सभी कर्म झूठे हैं।

7हे नानक ! वही इन्सान भाग्यवान् हैं, जिनका परम-सत्य परमेश्वर के साथ अटूट स्नेह बना हुआ है॥ २ ॥

8पउड़ी ॥

9गुरु साहिब का फुरमान है कि मैं उन महापुरुषों पर सदैव कुर्बान जाता हूँ, जो हरि-कथा सुनते रहते हैं।

10ऐसे महान् एवं पूर्ण गुणवान ही भगवान के समक्ष अप्रना शीश निवाते हैं।

11उनके वे हाथ अत्यंत सुन्दर हैं जो बेअंत हरि का यश लिखते हैं।

12जो चरण प्रभु के मार्ग पर चलते हैं, वे बड़े पवित्र एवं पावन हैं।

13संतों-महापुरुषों की संगति करने से ही मनुष्य का कल्याण होता है और सभी दुःख दूर हो जाते हैं।॥ १४॥

14श्लोक ॥

15पूर्ण संयोग से जिस मनुष्य का भाग्य उदय होता है, वही भगवान का सिमरन करता है।

16हे नानक ! वह मुहूर्त फलदायक एवं शुभ है, जब जगतपालक परमेश्वर के दर्शन होते हैं।॥ १॥

17उसने मुझे आशा से भी अधिक अनन्त सुख प्रदान किए हैं, अतः मैं उसका मूल्यांकन नहीं कर सकता।

18हे नानक ! वह शुभ समय परवान है, जब मुझे मेरा प्रिय-परमेश्वर मिल जाता है॥ २॥

19पउड़ी॥

20बताओ, वह कौन-सा समय है, जब प्रभु की प्राप्ति होती है।

21वही मुहूर्त व भला संयोग है, जब परमेश्वर प्राप्त होता है।

22उस हरि का आठ प्रहर सिमरन करने से सभी मनोकामनाएँ पूरी हो गई हैं।

23अहोभाग्य से ही संतों की संगति मिली है और मैं झुककर उनके चरणों में लगता हूँ।

24हे नानक ! मेरे मन में ईश्वर के दर्शनों की तीव्र लालसा है और उस पर मैं तन-मन से कुर्बान जाता हँ ॥ १५ ॥

25श्लोक ॥

26पतितों को पावन करने वाला गोविन्द ही सर्व दोषों का निवारण करने वाला है।

27हे नानक ! जो ‘हरि-हरि' नाम-मंत्र जपते रहते हैं, भगवान उन्हें शरण देने में समर्थ है॥१॥

28हे नानक ! जो अपने अहम् को छोड़कर चरणों में लग गया है,

29प्रभु के दर्शन करने से उस मनुष्य के सभी दुःख एवं ताप दूर हो गए हैं।॥ २॥

30पउड़ी॥

31हे दयालु ईश्वर ! मुझे अपने साथ मिला लो, मैं तेरे द्वार पर आ गिरा हूँ।

32हे दीनदयाल ! मुझे बचा लो, मैं योनि-चक्र में भटकता हुआ बहुत थक गया हूँ।

33हे हरि ! तेरा विरद् भक्तवत्सल एवं पतितों का कल्याण करना है।

34तेरे बिना अन्य कोई नहीं है, जो मेरी विनती को स्वीकार करे।

35हे दयालु! मेरा हाथ पकड़कर इस संसार-सागर से मुझे पार करवा दो॥ १६॥

36श्लोक॥

37दयालु परमेश्वर ही संतों का कल्याण करने वाला है, अतः उस प्रभु का कीर्तन ही उनके जीवन का एकमात्र सहारा है।

38हे नानक ! संतों-महापुरुषों की संगति करने एवं परमेश्वर की शरण लेने से मनुष्य का मन निर्मल हो जाता है॥ १॥

39चन्दन का लेप लगाने, चाँदनी रात एवं शरद् ऋतु से मन की जलन बिल्कुल दूर नहीं होती।

40हे नानक ! हरि-नाम का जाप करने से मन शीतल एवं शांत हो जाता है ॥ २ ॥

41पउड़ी ॥

42भगवान के चरण-कमलों की शरण में आने से ही समस्त भक्तजनों का कल्याण हो गया है।

43गोविन्द का यश-प्रताप सुनने से उनका मन निर्भीक हो गया है।

44नाम रूपी धन संचित करने से जीवन में किसी भी प्रकार की पदार्थ की कमी नहीं रहती।

45संतजनों से संगत बड़े पुण्य करम से होती है।

46इसलिए आठ प्रहर भगवान का ही ध्यान करते रहना चाहिए और नित्य ही हरि-यश सुनना चाहिए॥ १७॥

47श्लोक ॥

48यदि परमात्मा का भजन-कीर्तन एवं उसका नाम-सिमरन किया जाए तो वह दया करके समस्त दुःख-क्लेशों को मिटा देता है।

49हे नानक ! परमपुरुष भगवान जिस पर कृपा कर देता है, वह मोह-माया से निर्लिप्त हो जाता है॥ १ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं