सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 708 · Raag Jaithsree · Guru Arjan Dev Ji

1वह काम, क्रोध एवं अहंकार में मग्न होकर पागलों की तरह घूम रहा है।

2लेकिन जब मृत्यु की चोट इसके सिर पर आकर लगी तो वह पश्चाताप कर रहा है।

3पूर्ण गुरुदेव के बिना जीव एक शैतान की भांति घूमता रहता है॥ ६ ॥

4श्लोक॥

5मानव जीव अपने जीवन में जिस राज्य, सौन्दर्य, धन-दौलत एवं उच्च कुल का घमण्ड करता रहता है, दरअसल ये सभी प्रपंच मात्र छल-कपट ही हैं।

6वह बड़े छल-कपट एवं दोषों द्वारा विष रूपी धन संचित करता है। परन्तु हे नानक ! सत्य तो यही है कि परमात्मा के नाम-धन के सिवाय कुछ भी उसके साथ नहीं जाता॥ १॥

7तूंबा देखने में बड़ा सुन्दर लगता है लेकिन मानव जीव इसे देखकर भूल में फंस जाता है।

8इस तूम्बे का एक कौड़ी मात्र भी मूल्य प्राप्त नहीं होता। हे नानक ! धन-दौलत जीव के साथ नहीं जाते ॥ २ ॥

9पउड़ी ॥

10गुरु साहिब का फुरमान है कि उस धन को हम क्यों संचित करें ? जो संसार से जाते समय हमारे साथ ही नहीं जाता।

11जिस धन को हमने इस दुनिया में ही छोड़कर चल देना है, बताओ, उसे प्राप्त करने के लिए हम क्यों प्रयास करें ?

12भगवान को भुलाकर मन कैसे तृप्त हो सकता है? यह मन भी प्रसन्न नहीं हो सकता।

13जो इन्सान प्रभु को छोड़करं सांसारिक प्रपंचों में लीन रहता है, आखिरकार वह नरक में ही बसेरा करता है।

14नानक प्रार्थना करता है कि हे दया के घर, परमेश्वर ! कृपालु होकर हमारा भय नष्ट कर दो ॥ १०॥

15श्लोक॥

16गुरु साहिब का फुरमान है कि न ही राज्य इत्यादि के सुख-वैभव मीठे हैं, न ही भोगने वाले रस मीठे हैं और न ही धन-दौलत के सुख मीठे हैं।

17हे नानक ! भगवान के संतों महापुरुषों की पवित्र संगति ही मीठी है और भक्तजनों को प्रभु के दर्शन ही मीठे लगते हैं।॥ १॥

18मुझे तो ऐसी मुहब्बत हो गई है, जिसके भीतर ही मेरा मन मग्न हो गया है।

19हे नानक ! मेरा यह मन भगवान के सत्य नाम रूपी धन के साथ लग गया है और वह मालिक ही मुझे मीठा लगता है॥ २ ॥

20पउड़ी॥

21भक्तजनों को भगवान (की भक्ति) के सिवाय कुछ भी मीठा नहीं लगता।

22मैंने भलीभांति यह निर्णय करके देख लिया है कि नाम के सिवाय जीवन के अन्य सभी स्वाद फीके हैं।

23जब गुरु मेरा मध्यस्थ बन गया तो अज्ञान, भ्रम एवं दुःख कट गया।

24मेरा मन भगवान के चरण-कमलों से ऐसे बिंध गया है, जैसे मजीठ से कपड़े को पक्का रंग चढ़ जाता है।

25मेरी यह आत्मा, प्राण, तन एवं मन सब प्रभु के ही हैं और अन्य सभी झूठे मोह नष्ट हो गए हैं।॥ ११॥

26श्लोक ॥

27जैसे जल को त्याग कर मछली जीवित नहीं रहती, जैसे एक पर्पीहा भी मेघ मण्डल को त्याग कर जीवित नहीं रहता,

28जैसे एक मृग सुन्दर नाद को श्रवण करके मुग्ध हो जाता है, जैसे भेंवरा फूलों की सुगन्धि के बन्धन में फंस जाता है।

29हे नानक ! वैसे ही सन्त-महात्मा प्रभु के चरण-कमलों में मग्न रहते हैं और उसके सिवाय उनकी किसी अन्य में कोई रुचि नहीं होती ॥ १॥

30हे प्रभु ! यदि एक क्षण भर के लिए भी तेरे मुख के मुझे दर्शन हो जाएँ तो तुझे छोड़कर मैं अपना चित किसी दूसरे में नहीं लगाऊँगा।

31हे नानक ! वास्तविक जीवन तो उस मालिक-परमेश्वर के संगम में ही है, जो संतो-महापुरुषों का घनिष्ठ मित्र है॥ २॥

32पउड़ी ॥

33जिस तरह मछली जल के बिना जीवन प्राप्त नहीं कर पाती,

34जिस तरह एक पर्पीहा स्वाति बूंद के सिवाय कैसे तृप्त रह सकता है,

35जैसे एक मृग नाद को सुनकर आकर्षित होकर नाद की तरफ उठ दौड़ता है,

36भेंवरा पुष्पों की महक का लोभी है और पुष्प में ही फँस जाता है,

37वैसे ही संत-महापुरुषों की भगवान के साथ अटूट प्रीति है और उसके दर्शन प्राप्त करके वे आनंदित हो जाते हैं।॥ १२ ॥

38श्लोक ॥

39संतजन केवल भगवान के चरणों को ही स्मरण करते रहते हैं और सांस-सांस से उसकी आराधना में ही मग्न रहते हैं।

40हे नानक ! उन्हें अच्युत नाम विस्मृत नहीं होता और परमेश्वर उनकी प्रत्येक आशा पूरी करता है॥ १॥

41जिन श्रद्धालुओं के हृदय में भगवान का नाम सिला हुआ है तथा पल भर के लिए भी नाम उन से दूर नहीं होता।

42हे नानक ! सच्चा मालिक उनकी समस्त मनोकामनाएँ पूरी करता है और हमेशा ही उनकी देखरेख करता है॥ २ ॥

43पउड़ी ॥

44हे जगत के मालिक ! मुझ आशावान की आशा पूरी कीजिए।

45हे गोपाल, हे गोविन्द ! यदि तुम मुझे मिल जाओ तो मुझे कभी भी खेद एवं पश्चाताप नहीं होगा।

46मेरे मन में बड़ा चाव है, मुझे अपने दर्शन दो, ताकि मेरे सभी दुःख मिट जाएँ।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं