गुरु ग्रंथ साहिब 707 · Raag Jaithsree · Guru Arjan Dev Ji
1हे नानक ! ऐसे ही यदि हम परम-सत्य परमेश्वर को अपने हृदय में बसा लें तो दु:खों के अम्बार समाप्त हो जाते हैं।॥ २॥
2पउड़ी॥
3भगवान का नाम-सिमरन करने से करोड़ों पाप नाश हो जाते हैं।
4उसका स्तुतिगान करने से मनुष्य को मनोवांछित फल प्राप्त होता है।
5फिर जन्म एवं मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है और मनुष्य को अटल एवं शाश्वत स्थान मिल जाता है।
6यदि मनुष्य की पूर्व से ही ऐसी तकदीर लिखी हुई हो तो वह भगवान के चरणों में समा जाता है।
7नानक का कथन है कि हे प्रभु ! अपनी कृपा करके मेरी रक्षा करो चूंकि मैं तो तुझ पर ही बलिहारी जाता हूँ॥ ५॥
8श्लोक॥
9जो इन्सान अपने जीवन में घर की सुन्दर रचना, मन के विलासों, स्वादों एवं भोग रसों में ही मग्न रहते हैं और
10जो कभी भी भगवान का ध्यान-सिमरन नहीं करते, हे नानक ! इस प्रकार के व्यक्ति तो विष्ठा के ही कीड़े हैं॥ १ ॥
11जिस इन्सान के पास काफी साज-सजावट एवं सबकुछ उपलब्ध है और उसके हृदय में शान-शौकत से ही प्यार-मुहब्बत बना हुआ है लेकिन
12हे नानक ! यदि वह मालिक को भुला देता है तो उसका शरीर मात्र धूल के समान ही है॥ २॥
13पउड़ी ॥
14इन्सान के पास चाहे सुन्दर शैय्या, जीवन के तमाम सुख तथा रसों का भोग करने के लिए पूर्ण साम्रगी है।
15घर में चाहे स्वर्ण, चन्दन, सुगन्धि तथा पहनने हेतु हीरे-मोती उपलब्ध हैं।
16वह चाहे मनोवांछित सुख का आनंद प्राप्त करता हो और उसे कोई भी चिन्ता न हो
17परन्तु यदि वह प्रभु को याद नहीं करता तो वह विष्ठा के कीड़े समान ही है।
18हरि-नाम के बिना इन्सान को जीवन में शांति प्राप्त नहीं होती। फिर नाम के अलावा अन्य किस उपाय द्वारा मन को धैर्य हो सकता है॥ ६ ॥
19श्लोक॥
20परमात्मा के सुन्दर चरण-कमलों के विरह की पीड़ा से वैरागी वैराग्यवान बनकर उसे दसों दिशाओं में ढूंढता रहता है।
21हे नानक ! वह कपट रूप माया को त्याग देता है और आनंद रूपी संतों-महापुरुषों की पवित्र सभा में संगम करता है॥ १॥
22मेरे मन में परमात्मा का नाम विद्यमान है, अपने मुख से उसका ही नाम उच्चरित करता हूँ और समस्त देशों में भ्रमण करता हूँ।
23हे नानक ! जीवन के सभी आडम्बर झूठे हैं और परमात्मा की सच्ची कीर्ति सुनकर ही जीवित हूँ॥ २॥
24पउड़ी॥
25जो इन्सान टूटी हुई झोंपर्डी में रहता है और उसके वस्त्र भी फटे-पुराने हों,
26जिसकी न श्रेष्ठ जाति है, न ही आदर-सत्कार है और जो उजाड़ स्थल में भटकता है,
27जिसका न कोई मित्र अथवा शुभचिन्तक है, जो धन-दौलत एवं सौन्दर्य से विहीन है और जिसका कोई रिश्तेदार अथवा संबंधी भी नहीं,
28लेकिन यदि उसका मन परमात्मा के नाम में मग्न है तो वह सारे संसार का राजा है।
29उसकी चरण-धूलि से मन का कल्याण हो जाता है और प्रभु भी उस पर बड़ा प्रसन्न होता है॥ ७ ॥
30श्लोक॥
31अनेक लीलाओं, राज्यसुख, मनोरंजन, सौन्दर्य, सिर पर छत्र, चंवर, राजसिंहासन जैसे प्रपंचों में ही डूबे,
32कुछ मूर्ख, अज्ञानी एवं अन्धे मनुष्य रहते है। हे नानक ! माया के ये मनोरथ एक स्वप्न के समान हैं॥ १॥
33गुरु जी का फुरमान है कि आदमी स्वप्न में ही सभी सुख भोगता रहता है और उसका मोह उसे बड़ा मीठा लगता है।
34किन्तु हे नानक ! नाम के बिना यह सुन्दर दिखने वाली माया छलकपट ही है॥ २ ॥
35पउड़ी॥
36मूर्ख इन्सान का चित स्वप्नों में ही डूबा रहता है।
37जब वह स्वप्न से जागता है तो उसे माया के प्रपंच-राज्यसुख, मनोरंजन तथा भोग-विलास इत्यादि भूल जाते हैं और वह मायूस हो जाता है।
38इन्सान की सारी जिन्दगी संसार के धन्धों में भागदौड़ करते ही बीत गई है।
39माया के मोह में मग्न रहने के कारण जिस उद्देश्य से वह जीवन में आया था, उसका कार्य सम्पूर्ण नहीं हुआ।
40सच तो यही है कि जब भगवान ने स्वयं ही उसे मोह-माया में भटकाया हुआ है तो जीव बेचारा भी क्या कर सकता है॥ ८॥
41श्लोक॥
42प्राणी चाहे स्वर्ग लोक में रहता हो, चाहे उसने पृथ्वी के नौ खण्डों पर भी विजय प्राप्त कर ली हो,
43परन्तु यदि वह पृथ्वीपालक परमात्मा को विस्मृत कर देता है तो हे नानक ! वह भयानक वन में ही भटक रहा है॥ १॥
44हे नानक ! जिन्हें कौतुक, आनंद एवं खेल-तमाशों के कारण परमात्मा का नाम याद नहीं आता,
45वे मनुष्य नरक में रहने वाले कुष्ठी समान हैं और उनका निवास स्थान भी उजाड़ समान है॥ २ ॥
46पउड़ी॥
47यह जगत एक महाभयानक वन के समान है परन्तु मूर्ख जीव ने इसे सुन्दर नगर समझ लिया है और
48झूठी साम्रगी को देखकर उसने सत्य समझ लिया है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं