सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 703 · Raag Jaithsree · Guru Tegh Bahaadur Ji

1राम-नाम रूपी रत्न हृदय में ही रहता है परन्तु इस बारे में कोई ज्ञान नहीं प्राप्त किया।

2हे नानक ! भगवान के भजन के बिना इसने अपना अमूल्य जन्म व्यर्थ ही बर्बाद कर दिया है॥ २॥ १॥

3जैतसरी महला ९ ॥

4हे परमात्मा ! मेरी लाज बचा लो।

5मेरे हृदय में मृत्यु का भय निवास कर चुका है। अतः हे कृपानिधि ! मैंने तेरी ही शरण ली है॥१॥ रहाउ॥

6में बड़ा पतित, मूर्ख एवं लालची हूँ और पाप कर्म करते-करते अब मैं थक चुका हूँ।

7मृत्यु का भय मुझे भूलता नहीं और इस चिन्ता ने मेरे शरीर को जलाकर रख दिया है॥१॥

8अपनी मुक्ति हेतु मैंने अनेक उपाय किए हैं और दसों दिशाओं में भी भागता रहता हूँ।

9भगवान मेरे हृदय में ही निवास कर रहा है किन्तु उसके भेद को नहीं जाना॥२॥

10हे प्रभु ! मुझ में कोई गुण नहीं और न ही कुछ सिमरन एवं तपस्या की है। फिर तुझे प्रसन्न करने हेतु अब कौन-सा कर्म करूँ ?

11नानक का कथन है कि हे प्रभु ! अब मैं निराश होकर तेरी शरण में आया हूँ, अतः मुझे अभय दान (मोक्ष दान) प्रदान कीजिए॥३॥२॥

12जैतसरी महला ९ ॥

13हे प्रिय मन ! यह सच्चा विचार धारण कर लो कि

14राम नाम के बिना यह समूचा संसार झूठा ही समझो॥१॥ रहाउ ॥

15जिस की खोज करते हुए योगी भी निराश हो चुके हैं और उसका अन्त नहीं पा सके,

16उस परमात्मा को तुम निकट ही समझो, चूंकि उसका रूप एवं चिन्ह बड़ा न्यारा है॥१॥

17भगवान का नाम इस दुनिया में पतितों को पावन बनाने वाला है परन्तु तूने उसे कदापि स्मरण नहीं किया।

18नानक का कथन है कि उसने उसकी शरण ली है, जिसकी समूचा जगत वन्दना करता है। हे प्रभु ! भक्तों की रक्षा करना ही तुम्हारा विरद् है, अतः मेरी भी रक्षा करो।॥२॥३॥

19जैतसरी महला ५ छंत घरु १

20ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

21श्लोक॥

22मैं तो दिन-रात प्रभु के दर्शनों की प्यासी हूँ, और नित्य उसको ही स्मरण करती रहती हूँ।

23हे नानक ! गुरु ने मेरे मन के कपाट खोलकर मुझे मित्र प्रभु के संग मिला दिया है॥ १॥

24छंद॥

25हे मेरे सज्जन, हे मित्र ! सुनो; मैं एक विनती करती हूँ,

26मैं उस मोहन प्रियतम को खोजती रहती हूँ।

27मुझे उस प्रियतम के बारे में बताओ, यदि वह एक क्षण भर के लिए मुझे दर्शन प्रदान कर दे तो मैं अपना सिर काट कर उसके समक्ष अर्पण कर दूँगी।

28मेरे नेत्र मेरे प्रिय के रंग में मग्न हैं और उसके बिना एक क्षण भर के लिए भी धैर्य नहीं करते।

29मेरा मन प्रभु के साथ ऐसे मग्न है, जैसे जल के साथ मछली एवं स्वाति बूंद के साथ पपीहा मग्न होता है।

30हे नानक ! मैंने पूर्ण गुरु पा लिया है और प्रियतम के दर्शन करने की मेरी सारी प्यास बुझ गई है॥ १॥

31हे सज्जन ! प्रिय प्रभु की जितनी भी सखियों है, उनमें से मैं तो किसी के भी तुल्य नहीं।

32यह सखियाँ एक से बढ़कर एक सुन्दर हैं। इसलिए मुझे किसने याद करना है ?

33मेरे प्रियतम प्रभु की एक से बढ़कर एक सुन्दर सखियाँ उसके साथ नित्य ही रमण करती हैं।

34उन्हें देखकर मेरे हृदय में भी चाव उत्पन्न होता है। मैं उस गुणों के भण्डार प्रभु को कब प्राप्त करूँगी।

35जिन्होंने मेरे प्रिय प्रभु को प्रसन्न किया है, मैं अपना मन उनके समक्ष अर्पण करती हूँ।

36नानक का कथन है कि हे सुहागिन ! मेरी एक विनती ध्यानपूर्वक सुनो, मुझे बताओ मेरा प्रिय प्रभु कैसा दिखता है॥ २॥

37हे सज्जन ! मेरा प्रिय-प्रभु वही करता है, जो उसे अच्छा लगता है। वह किसी के अधीन नहीं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं