सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 6 · Jap · Guru Nanak Dev Ji

1गिरिधर गोपाल कृष्ण तथा उसकी गोपियाँ भी उस निरंकार का गुणगान करती हैं ।

2महादेव तथा गोरख आदि सिद्ध भी उसकी कीर्ति को कहते हैं ।

3उस सृष्टिकर्ता ने इस जगत् में जितने भी बुद्धिमान किए हैं वे भी उसके यश को कहते हैं ।

4समस्त दैत्य व देवतादि भी उसकी महिमा को कहते हैं ।

5संसार के सभी पुण्य-कर्मी मानव, नारद आदि ऋषि-मुनि तथा अन्य भक्त जन उसकी प्रशंसा के गीत गाते हैं ।

6कितने ही जीव वर्तमान में कह रहे हैं, तथा कितने ही भविष्य में कहने का यत्न करेंगे ।

7कितने ही जीव भूतकाल में कहते हुए अपना जीवन समाप्त कर चुके हैं ।

8इतने तो हम गिन चुके हैं यदि इतने ही और भी साथ मिला लिए जाएँ ।

9तो भी कोई किसी साधन से उसकी अमूल्य स्तुति कह नहीं सकता ।

10जितना स्व-विस्तार चाहता है उतना ही विस्तृत हो जाता है ।

11श्री गुरु नानक देव जी कहते हैं कि वह सत्य स्वरूप निरंकार ही अपने अमूल्य गुणों को जानता है ।

12यदि कोई निरर्थक बोलने वाला परमेश्वर का अंत कहे कि वह इतना है

13तो उसे महामूखों में अंकित किया जाता है॥ २६ ॥

14उस प्रतिपालक ईश्वर का द्वार तथा घर कैसा है, जहाँ बैठकर वह सम्पूर्ण सृष्टि को सम्भाल रहा है ?

15(यहाँ पर सतिगुरु जी इस प्रश्न की निवृति में उत्तर देते हैं) हे मानव ! उसके द्वार पर नाना प्रकार के असंख्य वादन गूंज रहे हैं और कितने ही उनको बजाने वाले विद्यमान हैं ।

16कितने ही राग हैं जो रागिनियों के संग वहाँ गान किए जा रहे हैं और उन रागों को गाने वाले गंधर्व आदि रागी भी कितने ही हैं ।

17उस निरंकार का यश पवन, जल तथा अग्नि देव गा रहे हैं तथा समस्त जीवों के कर्मों का विश्लेषक धर्मराज भी उसके द्वार पर खड़ा उसकी महिमा को गाता है ।

18जीवों द्वारा किए जाने वाले कर्मों को लिखने वाले चित्र-गुप्त भी उस अकाल-पुरुष का यशोगान करते हैं तथा धर्मराज चित्रगुप्त द्वारा लिखे जाने वाले शुभाशुभ कर्मों का विचार करता है ।

19परमात्मा द्वारा प्रतिपादित शिव, ब्रह्मा व उनकी देवियों (शक्ति) जो शोभायमान हैं, सदैव उसका स्तुति-गान करते हैं ।

20हे निरंकार ! समस्त देवताओं व स्वर्ग का अधिपति इन्द्र अपने सिंहासन पर बैठा अन्य देवताओं के साथ मिलकर तुम्हारे द्वार पर खड़ा तुम्हारा यश गा रहे हैं ।

21सिद्ध लोग समाधियों में स्थित हुए तुम्हारा यश गाते हैं, जो विचारवान साधु हैं वे विवेक से यशोगान करते हैं ।

22तुम्हारा स्तुतिगान यति, सती और संतोषी व्यक्ति भी गाते हैं तथा पराक्रमी योद्धा भी तुम्हारी महिमा का गान करते हैं ।

23संसार के समस्त विद्वान व महान् जितेन्द्रिय ऋषि-मुनि युगों-युगों से वेदों को पढ़-पढ़ कर उस अकाल पुरुष का यशोगान कर रहे हैं ।

24मन को मोह लेने वाली समस्त सुन्दर स्त्रियां स्वर्ग लोक, मृत्यु लोक व पाताल लोक में तुम्हारा गुणगान कर रही हैं ।

25निरंकार द्वारा उत्पन्न किए हुए चौदह रत्न, संसार के अठसठ तीर्थ तथा उन में विद्यमान संत जन (श्रेष्ठ जन) भी उसके यश को गाते हैं ।

26सभी योद्धा, महाबली, शूरवीर अकाल पुरुष का यश गाते हैं, उत्पत्ति के चारों स्रोत (अण्डज, जरायुज, स्वेदज व उदभिज्ज) भी उसके गुणों को गाते हैं ।

27नवखण्ड, मण्डल व सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, जो उस सृजनहार ने बना-बना कर धारण कर रखे हैं, वे सभी तेरी स्तुति गाते हैं ।

28वास्तव में वे ही तेरी कीर्ति को गा सकते हैं जो तेरी भक्ति में लीन हैं, तेरे नाम के रसिया हैं, और जो तुझे अच्छे लगते हैं ।

29अनेकानेक और भी कई ऐसे जीव मुझे स्मरण नहीं हो रहे हैं, जो तुम्हारा यशोगान करते हैं, हे नानक ! मैं कहाँ तक उनका विचार करूँ, अर्थात् यशोगान करने वाले जीवों की गणना मैं कहाँ तक करूँ ।

30वह सत्यस्वरूप अकाल पुरुष भूतकाल में था, वही सद्गुणी निरंकार वर्तमान में भी है ।

31वह भविष्य में सदैव रहेगा, वह सृजनहार परमात्मा न जन्म लेता है और न ही उसका नाश होता है ।

32जिस सृष्टि रचयिता ईश्वर ने रंग-बिरंगी, तरह-तरह के आकार वाली व अनेकानेक जीवों की उत्पत्ति अपनी माया द्वारा की है ।

33अपनी इस उत्पत्ति को कर-करके वह अपनी रुचि अनुसार ही देखता है अर्थात् उनकी देखभाल अपनी इच्छानुसार ही करता है ।

34जो भी उस अकाल पुरुष को भला लगता है वही कार्य वह करता है और भविष्य में करेगा, इसके प्रति उसको आदेश करने वाला उसके समान कोई नहीं है ।

35गुरु नानक जी का फुरमान है कि हे मानव ! वह ईश्वर शाहों का शाह अर्थात् शहंशाह है, उसकी आज्ञा में रहना ही उचित है॥ २७ ॥

36गुरु जी कहते हैं कि हे मानव योगी ! तुम संतोष रूपी मुद्राएँ, दुष्कर्मों से लाज रूपी पात्र, पाप रहित होकर लोक-परलोक में बनाई जाने वाली प्रतिष्ठा रूपी चोली ग्रहण कर तथा शरीर को प्रभु की नाम-सिमरन रूपी विभूति लगाकर रख ।

37मृत्यु का स्मरण करना तेरी गुदड़ी है, शरीर का पवित्र रहना योग की युक्ति है, अकाल पुरुष पर दृढ़ विश्वास तुम्हारा डण्डा है । इन सब सदाचारों को ग्रहण करना ही वास्तविक योगी भेष है ।

38संसार के समस्त जीवों में तुम्हारा प्रेम हो अर्थात् उनके दुख-सुख को तुम अपना दुख-सुख अनुभव करो, यही तुम्हारा आई पंथ(योगियों का श्रेष्ठ पंथ ) है । काम आदिक विकारों से मन को जीत लेना जगत् पर विजय प्राप्त कर लेने के समान है ।

39नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण स्वरूप निरंकार को नमस्कार है ।

40जो सभी का मूल, रंग रहित, पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व अपरिवर्तनीय स्वरूप है॥ २८ ॥

41हे मानव ! निरंकार की सर्व-व्यापकता के ज्ञान का भण्डार होना तुम्हारा भोजन है, तुम्हारे हृदय की दया भण्डारिन होगी, क्योंकि दया-भाव रखने से ही सद्गुणों की प्राप्ति होती है। घट-घट में जो चेतन सत्ता प्रकट हो रही है वह नाद बजने के समान है।

42जिसने सम्पूर्ण सृष्टि को एक सूत्र में बांध रखा है, वही सृजनहार परमात्मा नाथ है, सभी ऋद्धियों-सिद्धियाँ अन्य प्रकार का स्वाद हैं।

43संयोग व वियोग रूपी नियम दोनों मिलकर इस सृष्टि का कार्य चला रहे हैं, कर्मानुसार ही जीवों को अपने-अपने भाग्य की प्राप्ति होती है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं