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गुरु ग्रंथ साहिब 699 · Raag Jaithsree · Guru Raam Daas Ji

1हे हरि ! कृपा करके मुझे गुरु से मिला दो, क्योंकि गुरु से मिलकर ही तेरे प्रति उमंग पैदा होती है।॥ ३॥

2उस अगम्य एवं अनंत प्रभु का कीर्ति-गान करो,

3क्षण-क्षण राम-नाम का स्तुतिगान करो।

4हे मेरे दाता गुरु ! कृपा करके मुझे दर्शन दीजिए, चूंकि नानक को तो भगवान की भक्ति की तीव्र लालसा लगी हुई है॥४॥२॥८॥

5जैतसरी मः ४ ॥

6मैं प्रेमपूर्वक रसों के घर राम का स्तुतिगान करता हूँ।

7मेरा मन राम के नाम से प्रसन्न हो गया है और नाम का लाभ प्राप्त कर रहा है।

8मैं दिन-रात प्रत्येक क्षण भक्ति करता हूँ और गुरु के उपदेश द्वारा मेरे मन में भक्ति की उमंग उत्पन्न होती है॥ १॥

9मैं भगवान का गुणगान करता हूँ, गोविन्द का जाप जपता रहता हूँ।

10अपने मन एवं तन पर विजय प्राप्त करके शब्द-गुरु का लाभ प्राप्त किया है।

11गुरु की शिक्षा द्वारा कामादिक शत्रु नियन्त्रण में आ गए हैं और मन एवं तन में भगवान की भक्ति का चाव उत्पन्न होता रहता है॥ २॥

12नाम अमूल्य रत्न है, अंतः हरि-नाम का जाप करो।

13भगवान का स्तुतिगान कर सदैव ही लाभ प्राप्त करो।

14हे दीनदयालु परमेश्वर ! मुझ पर कृपा करो और मेरे मन में नाम की लालसा उत्पन्न कर ॥ ३॥

15अपने मन में जगदीश्वर का जाप जपता रहूँ।

16इस जगत में जगन्नाथ हरि-नाम ही लाभप्रद है।

17नानक का कथन है कि हे मेरे ठाकुर प्रभु ! तू बड़ा धन्य-धन्य है, क्योंकि तेरा नाम जपकर ही भक्ति करने का चाव उत्पन्न होता है। ॥४॥३॥९॥

18जैतसरी महला ४ ॥

19ईश्वर स्वयं ही योगी है और स्वयं ही समस्त युगों में योग की युक्ति है।

20वह स्वयं ही निर्भीक होकर समाधि लगाता है।

21वह स्वयं ही सर्वव्यापक हो रहा है और मनुष्य को स्वयं ही नाम-सिमरन की उमंग प्रदान करता है॥ १॥

22वह स्वयं ही दीप, प्रकाश एवं प्रकाश करने वाला है।

23वह स्वयं ही सतगुरु है और स्वयं समुद्र मंथन करने वाला है।

24वह स्वयं ही मंथन करके तत्व निकालता है और नाम-रत्न का जाप करने से मन में भक्ति करने का चाव उत्पन्न होता है॥ २ ॥

25हे सत्संगी सखियो ! आओ, हम मिलकर भगवान का गुणगान करें।

26गुरु के उन्मुख रहकर नाम का जाप करो और भगवान के नाम का लाभ प्राप्त करो।

27मैंने हरि की भक्ति अपने मन में दृढ़ कर ली है और यही मेरे मन को भा गई है। हरि का नाम-सिमरन करने से मन में उत्साह बना रहता है॥ ३॥

28भगवान स्वयं ही बड़ा चतुर एवं महान् शाह है और

29गुरु के सान्निध्य में रहकर ही नाम की पूंजी प्राप्त होती है।

30नानक प्रार्थना करता है कि हे प्रभु ! कृपा करके मुझे नाम की देन प्रदान करो क्योंकि तेरे ही गुण मुझे भाते हैं और मेरे हृदय में नाम का उत्साह बना रहे॥४॥४॥१०॥

31जैतसरी महला ४ ॥

32मैं सत्संगत में मिलकर गुरु की संगत करता हूँ

33नाम की पूंजी संचित करता हूँ।

34हे मधुसूदन ! हे हरि ! मुझ पर कृपा करो ताकि सत्संगति में मिलकर मन में तेरी भक्ति करने के लिए तीव्र लालसा बनी रहे॥ १॥

35वाणी द्वारा अपने कानों से भगवान के गुण श्रवण करूँ

36हे परमेश्वर ! कृपा करके मुझे सतगुरु से मिला दो।

37मैं हरि का गुणगान करूँ, वाणी द्वारा तेरे गुण उच्चारण करूँ और हरि के गुण जपकर मेरे मन में तुझे मिलने के लिए उत्साह बना रहे॥ २॥

38मैंने समस्त तीर्थ, व्रत, यज्ञ एवं दान पुण्य के फलों को तोल लिया है।

39परन्तु यह सभी हरि-नाम सिमरण के बराबर नहीं पहुँचते।

40हरि का नाम अतुलनीय है, अत्यन्त महान् होने के कारण इसे तोला नहीं जा सकता, गुरु के उपदेश द्वारा ही हरि-नाम का जाप करने का उत्साह पैदा होता है॥ ३॥

41जो हरि-नाम जपता है, उसे सभी धर्म-कर्मो का फल मिल जाता है,

42इससे किल्विष-पापों की सारी मैल धुल जाती है।

43नानक प्रार्थना करता है कि हे दीनदयालु ! अपने सेवक पर दयालु हो जाओ तथा मेरे हृदय में अपना नाम देकर उत्साह बनाए रखो ॥ ४ ॥ ५॥ ११॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं