गुरु ग्रंथ साहिब 698 · Raag Jaithsree · Guru Raam Daas Ji
1जगत के जीवन परमात्मा ने जिस पर अपनी कृपा की है, उसने अपने मन एवं ह्रदय में उसे बसा लिया है।
2यमराज ने अपने दरबार में उनके कर्मो के कागज फाड़ दिए हैं। हे नानक ! उन परमात्मा के भक्तों का लेखा समाप्त हो गया है॥ ४॥ ५ ॥
3जैतसरी महला ४ ॥
4अहोभाग्य से मुझे संतों की सुसंगति प्राप्त हुई है, जिससे मेरा अस्थिर मन स्थिर हो गया है।
5अब मेरे मन में नित्य ही अनहद ध्वनि का नाद बजता रहता है और मैं हरिनामामृत की धारा के रस से तृप्त हो गया हूँ॥१॥
6हे मेरे मन ! सुन्दर हरि का राम-नाम जपो,
7गुरु ने मेरे मन एवं तन में प्रीति लगा दी है और भगवान ने मुझे गले लगा लिया है॥ रहाउ॥
8भगवान से विमुख व्यक्ति माया के बन्धनों में फँसे हुए हैं और वे दृढ़ता से विषैली माया को संचित करते रहते हैं।
9वे इस माया को भगवान के नाम पर खर्च नहीं कर सकते और अपने सिर पर यमों की पीड़ा ही सहते रहते हैं।॥ २ ॥
10जिन्होंने अपना शरीर भगवान की आराधना में लगाया है और बड़ी श्रद्धा से संत गुरुदेव की चरण-धूलि अपने मुख पर लगाई है,
11वे इहलोक एवं परलोक में भर्गवान की शोभा का पात्र बनते हैं चूंकि उनके मन को भगवान के प्रेम का गहरा रंग लगा होता है।॥ ३॥
12हे मेरे परमेश्वर ! मुझे साधुओं की संगति में मिला दो, क्योंकि मैं तो उन साधुजनों का एक कीड़ा ही हूँ।
13हे नानक ! मेरी प्रीति तो साधु-गुरुदेव के चरणों से ही लगी हुई है और उनसे मिलकर मेरा विमूढ़ कठोर मन खिल गया है॥ ४॥ ६॥
14जैतसरी महला ४ घरु २
15ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
16अगम्य एवं अपरंपार हरि का सिमरन करो,
17जिसका सिमरन करने से हमारा दुःख मिट जाता है।
18हे हरि ! मुझे महापुरुष सतगुरु से मिला दो, क्योंकि गुरु मिलने से ही सुख की प्राप्ति होती है॥१॥
19हे मेरे मित्रो ! भगवान के गुण गाओ;
20हरि-नाम को अपने हृदय में बसाकर रखो।
21मुझे हरि के अमृत वचन सुनाओ, जब गुरु मिल जाता है तो भगवान चित में प्रगट हो जाता है।॥२॥
22हे मधुसूदन ! हे हरि ! हे माधव ! तू ही मेरे प्राण है और
23मेरे मन एवं तन में तेरा नाम ही अमृत के समान मीठा लगता है।
24हे प्रभु ! दया करके मुझे गुरु से मिला दो, क्योंकि वही महापुरुष, माया से निर्लिप्त परमात्मा के समान है॥३॥
25हरि-नाम हमेशा सुख प्रदान करने वाला है।
26अतः मेरा मन हरि के रंग में ही मग्न रहता है।
27हे हरि ! मुझे महापुरुष गुरु से मिला दो, क्योंकि हे नानक ! गुरु के नाम द्वारा ही सुख प्राप्त होता है॥४॥१॥७॥
28जैतसरी मः ४ ॥
29सदा-सर्वदा हरि नाम का ही निरन्तर जाप करो;
30गुरु के सन्मुख रहकर सदैव ही नाम का लाभ प्राप्त करो।
31अपने मन में भगवान की भक्ति दृढ़ करो और हरि-नाम के लिए चाहत पैदा करो ॥१॥
32दया के घर हरि-नाम का ध्यान करो।
33भगवान के रंग में मग्न होकर सदा उसका गुणगान करो।
34हरि का यशोगान करो और निष्ठा से उसका ही नृत्य करो और बड़े चाव से संतों की सभा में शामिल होकर आनंद करो ॥ २ ॥
35है सत्संगी सखियो।आओ, हम भगवान की संगति में मिलें और
36हरि-कथा को सुनकर उसके नाम का लाभ प्राप्त करें।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं